वात्सल्य भाव से ही तीर्थंकर प्रकृति का बंध होता है : आचार्यश्री उदारसागर जी ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा में प्रेम यथार्थ, निष्कपटता के बारे में बताया
आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए वात्सल्य अंग की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वात्सल्य केवल किसी के प्रति प्रेम या मधुर व्यवहार का नाम नहीं है, बल्कि यह आत्मा की निर्मलता और निष्कपटता से उत्पन्न होने वाला श्रेष्ठ भाव है। साधर्मियों के प्रति अंतरंग और बहिरंग दोनों रूपों में वात्सल्य होना चाहिए। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर...
मुरैना • मनोज जैन नायक • 09-09-2026, 03:49 pm



















