तपस्या करने से होती कर्मों की निर्जरा : मुनि श्री गुरुदत्त सागर जी ने समझाया तप का अर्थ
श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन बुधवार को उत्तम तप धर्म पर प्रवचन देते हुए मुनि श्री गुरुदत्त सागरजी ने कहा कि तप का अर्थ इच्छाओं पर नियंत्रण रखकर शरीर, वाणी और मन को अनुशासित करते हुए आत्मा को शुद्ध करना है। महरौनी से पढ़िए, यह खबर... महरौनी
इंदौर • Shreephal Jain News • 04-09-2025, 01:22 am





















