धर्मसभा में दिए प्रवचन : हर महापुरुष के जीवन का चरम है, वैराग्य - मुनि श्री विनम्र सागर जी महाराज
संसार दो शब्दों से चल रहा है, एक है - आसक्ति दूसरा है विरक्ति। जब व्यक्ति घर से उबने लगता है तब आसक्ति विरक्ति में बदल रही होती है और उसे जागृति के भाव आते हैं। आसक्ति यानी जो आ तो सकती है लेकिन जा नहीं सकती। साधुओं को तप में आसक्ति होती है। महापुरुष के जीवन का चरम है, वैराग्य।उक
इंदौर • Shreephal Jain News • 22-08-2024, 04:43 pm





















