अंबाह। आर्यिका रत्न श्री संगम मति माताजी के सानिध्य में आयोजित 35 दिवसीय णमोकार महामंत्र पाठ एवं आरती महोत्सव के तहत बीती शाम वीतराग शासन बहू मंडल द्वारा भव्य आरती कार्यक्रम किया गया। धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने शामिल होकर धर्मलाभ लिया। बाजार में निकली शोभायात्रा और जैन बगीची परिसर में हुई श्रीजी की आरती से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। कार्यक्रम के तहत श्रद्धालुओं ने श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ णमोकार महामंत्र का सामूहिक पाठ किया।
भक्ति गीतों से जैन बगीची परिसर में आध्यात्मिक वातावरण
इसके बाद बाजार में धार्मिक शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा में महिलाएं, पुरुष, युवा और बच्चे उत्साह के साथ शामिल हुए। श्रद्धालु भक्ति गीतों और धार्मिक जयकारों के साथ आगे बढ़ते रहे। शोभायात्रा के दौरान नगर में जगह-जगह धार्मिक वातावरण नजर आया। इसके बाद शोभायात्रा जैन बगीची परिसर पहुंची, जहां श्रीजी की भव्य आरती का आयोजन किया गया। वीतराग शासन बहू मंडल की महिलाओं ने श्रद्धा के साथ भगवान की आरती की। दीपों की रोशनी और भक्ति गीतों से जैन बगीची परिसर आध्यात्मिक वातावरण से भर गया। श्रद्धालुओं ने भगवान के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर सुख, शांति और आत्मकल्याण की भावना के साथ आराधना की।
आरती केवल दीपक जलाना नहीं, आत्मा में गुणों का प्रकाश जगाना है
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आर्यिका रत्न 105 श्री संगम मति माताजी ने भगवान की आरती के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आरती केवल दीपक जलाने की क्रिया नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और आत्मशुद्धि का भाव है। भगवान के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित करते समय यह भावना रखनी चाहिए कि हमारे भीतर के अज्ञान, क्रोध, मान, माया और लोभ का अंधकार दूर हो तथा आत्मा में ज्ञान और विवेक का प्रकाश जागृत हो।
दीपक स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है
माताजी ने कहा कि भगवान की आरती करते समय हमारा ध्यान केवल बाहरी क्रिया पर नहीं, बल्कि भगवान के गुणों और उनके आदर्शों पर होना चाहिए। भगवान के गुणों का स्मरण करते हुए उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना ही आरती की वास्तविक भावना है। जिस प्रकार दीपक स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन में त्याग, संयम, करुणा, सत्य और परोपकार का प्रकाश फैलाना चाहिए।
मन में मौजूद विकारों को दूर कर गुणों को प्रकट करें
उन्होंने कहा कि सच्ची आरती वही है, जिसके बाद व्यक्ति के आचरण में परिवर्तन दिखाई दे। यदि आरती करने के बाद भी मनुष्य क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह में उलझा रहता है तो आरती का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता। आरती के माध्यम से हमें अपने भीतर की बुराइयों को दूर करने और सद्गुणों को अपनाने का संकल्प लेना चाहिए। माताजी ने श्रद्धालुओं से कहा कि भगवान की आरती के साथ अपने जीवन की भी आरती करें, अर्थात अपने मन में मौजूद विकारों को दूर कर आत्मा के गुणों को प्रकट करने का प्रयास करें। उन्होंने अहिंसा, संयम, सदाचार और परोपकार को जीवन का हिस्सा बनाने की प्रेरणा दी।
निरंतर सहभागी बनने का संकल्प
35 दिवसीय णमोकार महामंत्र पाठ एवं आरती महोत्सव के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह दिखाई दिया। कार्यक्रम के अंत में सभी ने माताजी का आशीर्वाद प्राप्त किया और धार्मिक आयोजनों में निरंतर सहभागी बनने का संकल्प लिया।





