दिल्ली। ऋषमोदय, ऋषभ बिहार में विराजित दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति के उन्नायक अध्यात्मयोगी पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने धर्मसभा में जीवन को सुख, शांति और आनंदमय बनाने के लिए व्यवहार, सत्य, संवाद और आत्मसंयम से जुड़े महत्वपूर्ण सूत्र बताए।

अपयश से बचें, यशस्वी जीवन जिएं

पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि यदि जीवन को सुख, शांति और आनंदपूर्वक जीना है तो अपयश से बचना चाहिए। जीवन में यश होना श्रेष्ठ है और यशस्वी जीवन ही सुखद होता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को जीवन में विसंवाद से बचना चाहिए और संवाद को अपनाना चाहिए। परस्पर संवाद के माध्यम से ही समस्याओं का समाधान संभव है। विवाद समाप्त करना हो तो झगड़े की स्थिति में भी एक-दूसरे से बातचीत बंद नहीं करनी चाहिए।

भ्रम और शंका से शुरू होता है विसंवाद

आचार्यश्री ने कहा कि जहां भ्रम और शंका उत्पन्न होती है, वहीं से विसंवाद शुरू होता है। इससे बचने के लिए अपनी सोच को समीचीन रखना आवश्यक है। सही सोच, सही दृष्टि और समीचीन चिंतन विवादों को शांत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने कहा कि संवाद एक महान शक्ति है। इसलिए मन न मिलने पर भी बातचीत का रास्ता बंद नहीं करना चाहिए।

सत्य को जानो, सम्प्रदाय मत बना

पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने सत्य की महत्ता बताते हुए कहा कि जीवन में प्रयत्नपूर्वक सत्य को जानना, पहचानना, सीखना, बोलना और लिखना चाहिए। सत्यपूर्ण जीवन ही वास्तविक धर्म है।

उन्होने कहा कि सत्य शांति का द्वार है। सत्य को स्वीकार करें और उसका आचरण करें, लेकिन सत्य के नाम पर आपसी संघर्ष खड़ा न करें। सत्य को जानकर विवाद को शांत करना चाहिए। सत्यवादी व्यक्ति को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन अततः सत्य की ही विजय होती है।

वाणी वीणा बने, शूल नहीं

आचार्यश्री ने वाणी के महत्व पर कहा कि व्यक्ति की वाणी मधुर, हितकारी, संशयहारी और सुखद होनी चाहिए। बोलने से पहले विचार करना चाहिए। वाणी विनम्र होनी चाहिए, कांटे की तरह चुभने वाली नहीं।

उन्होंने कहा कि व्यक्ति का एक वाक्य शत्रु को मित्र बना सकता है, जबकि एक कटु वाक्य मित्र को शत्रु बना सकता है। वाणी की मधुरता मनुष्य के व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाती है और उसके आंतरिक भावों को भी प्रकट करती है।

श्वासों को संभालो, कषाय शांत करो

पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने श्वास और आंतरिक भावों के संबंध की ओर संकेत करते हुए कहा कि व्यक्ति की श्वासों से उसके भावों का अनुमान लगाया जा सकता है। क्रोध, कामना और कषाय की स्थिति में श्वासें तीव्र होती हैं, जबकि योगी की श्वासें शांत और मंद होती हैं।

उन्होंने कहा कि श्वासों को संभालना जीवन को संभालने के समान है। जब मनुष्य अपनी आंतरिक चंचलता और आकांक्षाओं को शांत करता है तो उसके भीतर शांति का विकास होता है।

राग-द्वेष से मुक्त होना ही कल्याण का मार्ग

आचार्यश्री ने कहा कि कल्याण की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को राग-द्वेष और संक्लेश से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। आत्मा का स्वभाव निर्मल है और साधना का उद्देश्य इसी निर्मलता की ओर लौटना है।

उन्होंने शून्य का उदाहरण देते हुए कहा कि शून्य का अपना महत्व है और उचित स्थान मिलने पर वह संख्या की शक्ति को कई गुना बढ़ा देता है। इसी प्रकार मनुष्य को बाहरी उपलब्धियों के साथ अपने भीतर की शक्ति को पहचानना चाहिए। आत्मस्वभाव की पहचान और राग-द्वेष से मुक्ति ही आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाती है।

धर्मसभा का संदेश

पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के प्रवचन का मूल संदेश रहा कि यशस्वी जीवन के लिए सद्व्यवहार, विवादों के समाधान के लिए संवाद, जीवन की शांति के लिए सत्य और व्यक्तित्व की गरिमा के लिए मधुर वाणी आवश्यक है। राग-द्वेष, कषाय और अनावश्यक आकांक्षाओं को कम करके मनुष्य आत्मिक शांति की ओर बढ़ सकता है।