इंदौर। नेमिनगर जैन कॉलोनी के घूंघट गार्डन स्थित सन्मति समवशरण में धर्मसभा का श्रावक और श्राविकाएं पुण्यलाभ अर्जित कर रहे हैं। यहां हो रही धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री सुनीलसागर जी गुरुदेव ने कहा कि संसार में धन, अन्न, कंचन और राजसुख प्राप्त करना कठिन अवश्य है, लेकिन परिश्रम और पुरुषार्थ के माध्यम से इन्हें प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इन सभी सांसारिक उपलब्धियों से भी अधिक दुर्लभ यदि कुछ है, तो वह है—यथार्थ ज्ञान। गुरुदेव ने कहा कि धन और अन्न प्राप्त हो सकते हैं, कंचन भी किसी न किसी प्रकार मिल सकता है और राजसुख भी पुरुषार्थ से प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन आत्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान सहजता से प्राप्त नहीं होता। यथार्थ ज्ञान बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि भीतर की अनुभूति से प्रकट होता है।

आत्मस्वरूप को जानने का पुरुषार्थ भी करें

आचार्य श्री ने कहा कि बड़ी-बड़ी पुस्तकें मनुष्य को मार्ग अवश्य दिखा सकती हैं, ज्ञान प्राप्ति की दिशा बता सकती हैं, लेकिन वास्तविक ज्ञान केवल पुस्तकों को पढ़ लेने से नहीं आता। जब मनुष्य अपने भीतर उतरता है। आत्मचिंतन करता है और आत्मानुभूति की ओर बढ़ता है, तभी यथार्थ ज्ञान का अनुभव होता है। आचार्य श्री ने कहा कि संसार की वस्तुएं बाहर से प्राप्त की जा सकती हैं, जबकि आत्मज्ञान भीतर से प्रकट होता है। इसलिए मनुष्य को बाहरी उपलब्धियों के पीछे भागने के साथ-साथ अपने भीतर झांकने और आत्मस्वरूप को जानने का पुरुषार्थ भी करना चाहिए। यही जीवन की वास्तविक दिशा है और यही यथार्थ ज्ञान की ओर ले जाने वाला मार्ग है।