सनावद। पर्युषण महापर्व अर्थात दशलक्षण पर्व के समापन पर सकल जैन समाज ने क्षमावाणी पर्व हर्षोल्लास और आत्मीयता के साथ मनाया। समाजजनों ने भगवान के समक्ष हाथ जोड़कर तथा परस्पर गले मिलकर क्षमा याचना की।
मन की सफाई का पर्व
सन्मति जैन काका ने बताया कि जैन धर्म में पर्युषण पर्व को आत्मजागृति और आत्मशुद्धि का पर्व माना गया है। भगवान महावीर स्वामी ने आत्मकल्याण के लिए दस धर्मों के रूप में दस दीपक दिए हैं। पर्युषण पर्व अंत:करण में दया, क्षमा और मानवता के भाव जगाता है।
जिस प्रकार दीपावली पर घर की साफ-सफाई की जाती है, उसी प्रकार यह पर्व मन की सफाई का अवसर है। इसलिए क्षमा याचना की शुरुआत अपने मन से होनी चाहिए।
कटुता मिटे, तभी क्षमावाणी सार्थक
संदेश दिया गया कि जब तक मन की कटुता दूर नहीं होती, तब तक क्षमावाणी पर्व का वास्तविक उद्देश्य पूर्ण नहीं होता। जीवन की कलुषता, गिले-शिकवे और भेदभाव भुलाकर एक-दूसरे से क्षमा मांगना तथा दूसरों को क्षमा करना ही क्षमा धर्म का सार है।
तीन जिनालयों में हुआ श्रीजी का अभिषेक
दोपहर में परंपरानुसार सर्वप्रथम आदिनाथ जिनालय, तत्पश्चात सुपार्श्वनाथ मंदिर और अंत में पार्श्वनाथ जैन बड़ा मंदिर में श्रीजी का अभिषेक किया गया। भगवान की माला लेने का सौभाग्य शैलेश कुमार, नमन और मुदित लाठिया परिवार को प्राप्त हुआ।
परस्पर क्षमा याचना
अभिषेक के पश्चात सभी समाजजनों ने भगवान के समक्ष हाथ जोड़कर क्षमा याचना की। एक-दूसरे से गले मिलकर विगत वर्ष में जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए क्षमा मांगी और आपसी भेदभाव समाप्त करने का संकल्प लिया।
श्रीफल साथी : सन्मति जैन काका, सनावद





