इंदौर में कल एक मुनिराज के समाधिमरण के पश्चात उनके अग्नि संस्कार को लेकर जिस प्रकार का विवाद सार्वजनिक चर्चा और मीडिया तक पहुँचा, वह केवल एक घटना नहीं, बल्कि पूरे जैन समाज के लिए आत्ममंथन का विषय है। यह स्थिति हमें भीतर तक झकझोरने वाली है।

प्रश्न किसी व्यक्ति, संस्था या व्यवस्था पर आरोप लगाने का नहीं है। प्रश्न हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का है।

हम बड़े-बड़े धार्मिक आयोजन करते हैं, लाखों-करोड़ों की व्यवस्थाएँ करते हैं, शोभायात्राएँ निकालते हैं, दान देते हैं और धर्म के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं। लेकिन जब किसी साधु के समाधिमरण के बाद उनके अंतिम अग्नि संस्कार के लिए एक उचित, सुरक्षित और स्थायी भूमि की आवश्यकता सामने आती है और हम उसके लिए भी व्यवस्थित व्यवस्था नहीं कर पाते, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है?

क्या हमारा समाज इतना कमजोर हो गया है कि अपने आराध्य साधु के अंतिम संस्कार के लिए भी हमें सरकार की ओर देखना पड़े?

सरकार से अपेक्षा करना गलत नहीं है, लेकिन उससे पहले हमें स्वयं से पूछना चाहिए—क्या हमने अपनी जिम्मेदारी पूरी की?

आज आवश्यकता व्हाट्सऐप पर एक-दूसरे को संदेश भेजकर विवाद बढ़ाने की नहीं, बल्कि मूल भावना तक पहुँचने की है। सोशल मीडिया पर बहस करने से समाधान नहीं निकलेगा। समाधान तब निकलेगा, जब समाज के सक्षम लोग, संस्थाएँ और दानदाता आगे आएँ और कहें—साधु के समाधिमरण के बाद उनके अंतिम संस्कार के लिए भूमि की व्यवस्था समाज स्वयं करेगा।

हमारी आस्था केवल उत्सवों में दिखाई दे, यह पर्याप्त नहीं है। आस्था की वास्तविक परीक्षा उस समय होती है, जब किसी साधु के अंतिम संस्कार जैसी गंभीर और संवेदनशील आवश्यकता सामने आती है।

यह समय किसी को दोष देने का नहीं, बल्कि एक स्थायी व्यवस्था बनाने का है। इंदौर सहित देश के विभिन्न नगरों में जैन समाज के पास अनेक संस्थाएँ, ट्रस्ट और सक्षम दानदाता हैं। यदि समाज सामूहिक संकल्प करे तो एक ऐसी भूमि निश्चित रूप से प्राप्त की जा सकती है, जहाँ भविष्य में किसी साधु के समाधिमरण के बाद पूरे सम्मान, गरिमा और धार्मिक मर्यादा के साथ अंतिम संस्कार किया जा सके।

बड़े आयोजन समाज की शक्ति दिखाते हैं, लेकिन संकट के समय खड़ी की गई स्थायी व्यवस्था समाज की परिपक्वता दिखाती है।

हमारी टीम ने इस विषय पर इंदौर की कई संस्थाओं और समाज के कुछ प्रमुख लोगों से व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर उनके विचार और सहयोग जानने का प्रयास किया है। दोपहर तक उनके उत्तर प्राप्त होने के बाद हम इस विषय को और विस्तार से समाज के सामने रखेंगे।

लेकिन उससे पहले एक सवाल हर जैन से है—

क्या हम अपने साधु के लिए इतना भी नहीं कर सकते कि उनके समाधिमरण के बाद अंतिम संस्कार के लिए एक सम्मानजनक और स्थायी भूमि उपलब्ध हो?

यदि इसका उत्तर “हाँ” है, तो अब केवल चर्चा नहीं—संकल्प और कार्यवाही का समय है।

क्योंकि साधु के प्रति हमारी श्रद्धा केवल उनके जीवनकाल तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उनके समाधिमरण के बाद भी उनकी अंतिम यात्रा और अंतिम संस्कार हमारी सामूहिक श्रद्धा, संस्कार और जिम्मेदारी का परिचय होना चाहिए।

आइए, विवाद को नहीं—व्यवस्था को जन्म दें।

आरोप को नहीं—समाधान को आगे बढ़ाएँ।

और आज ही ऐसा संकल्प लें कि भविष्य में किसी साधु के अंतिम संस्कार के लिए भूमि को लेकर जैन समाज को

कभी असहाय होकर खड़ा न होना पड़े।