कोटा। श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में रविवार को धर्म, आस्था और अध्यात्म का भव्य संगम देखने को मिलेगा। परम पूज्य आचार्य भगवन श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में वर्षायोग चातुर्मास कलश स्थापना महामहोत्सव का आयोजन रविवार सुबह 8 बजे से होगा। आयोजन को लेकर सकल दिगम्बर जैन समाज में उत्साह और श्रद्धा का वातावरण है।
देशभर से पहुंच रहे श्रद्धालु
चातुर्मास कमेटी के मुख्य संयोजक हुकम जैन काका ने बताया कि जैन परंपरा में चातुर्मास आत्मशुद्धि, संयम, साधना, स्वाध्याय और धर्माराधना का विशेष अवसर है। कलश स्थापना समारोह इसी आध्यात्मिक यात्रा का मंगल शुभारंभ होगा।
मंदिर अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ एवं महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि समारोह में शामिल होने के लिए कोटा सहित देशभर से श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने और वाहनों की पार्किंग के लिए विभिन्न स्थानों पर व्यवस्थाएं की गई हैं।
मंगलाचरण से शुरू होंगे धार्मिक आयोजन
महामहोत्सव का शुभारंभ मंगलाचरण से होगा। इसके बाद चित्र अनावरण, दीप प्रज्ज्वलन, आचार्यश्री की संगीतमय पूजन-अर्चना, पाद प्रक्षालन और शास्त्र भेंट सहित विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम होंगे। इसके पश्चात निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज के मंगल प्रवचन होंगे।
समारोह में विभिन्न धार्मिक कलशों की बोलियां एवं घोषणाएं भी की जाएंगी, जिन्हें लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है।
रजतमय कलश रहेंगे आकर्षण
वर्षायोग कलश स्थापना महामहोत्सव में अमृत सिद्धि, सर्वार्थ सिद्धि एवं ऋद्धि-सिद्धि के तीन रजतमय कलश विशेष आकर्षण का केंद्र रहेंगे। इनके साथ ज्ञानाराधना, दर्शनाराधना, चारित्राराधना, तपाराधना तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यक्चारित्र भक्ति कलश भी समारोह की धार्मिक गरिमा बढ़ाएंगे।
संतोष को बताया सबसे बड़ा धन
श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी में मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार ग्रंथ की वाचना करते हुए आचार्य समन्तभद्र स्वामी के श्लोक क्रमांक 14 के माध्यम से अमूढ़ दृष्टि अंग पर देशना दी।
मुनिश्री ने कहा कि अमूढ़ दृष्टि वाला श्रावक परिस्थितियां कैसी भी हों, धर्म और आस्तिक भाव से विमुख नहीं होता। वह विवेकपूर्वक आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ता है और धर्म के प्रति दृढ़ आस्था बनाए रखता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य की इच्छाएं असीमित हैं, जबकि शरीर की भूख सीमित है। इसलिए लोभ और अनावश्यक संग्रह के बजाय संतोष को जीवन का सबसे बड़ा धन मानना चाहिए। मुनिश्री ने चींटी से संग्रह और हाथी से संतोष की सीख लेने का संदेश दिया।
धर्म से विमुख न होने का संदेश
मुनिश्री ने कहा कि देव, शास्त्र और गुरु के प्रति दृढ़ आस्था के साथ विवेक को जागृत रखना ही सच्चे धर्म का आधार है। धर्म से विमुख हुए बिना संयम, संतोष और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना ही श्रावक जीवन की सार्थकता है।



