कुण्डलपुर। दीपावली भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण कल्याणक का पावन अवसर है। हम प्रतिवर्ष कार्तिक कृष्ण अमावस्या को पावापुरी की सिद्धभूमि का स्मरण करते हुए निर्वाण लाडू चढ़ाते हैं और दीप जलाकर खुशियां मनाते हैं, लेकिन यह समझना आवश्यक है कि निर्वाण की प्राप्ति केवल बाहरी क्रियाओं से नहीं, बल्कि केवलज्ञान की परिपूर्णता और आत्मशुद्धि के पुरुषार्थ से होती है। मुक्ति के मार्ग पर चलने वाला साधक एक न एक दिन मुक्ति को अवश्य प्राप्त करता है। यह बात मुनि श्री समतासागर जी ने कुण्डलपुर में प्रवचन में कही। इस अवसर पर राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया भगवान महावीर निर्वाण महोत्सव 9 नवंबर को मनाया जाएगा। मुनि श्री समतासागर जी ने कहा कि दीपावली के संदर्भ में बाहरी स्वच्छता के साथ मन की स्वच्छता, कषायों पर विजय, स्वाध्याय और जीवन में चारों पुरुषार्थों के संतुलन का महत्वपूर्ण संदेश दिया। मुनि श्री ने कहा कि दीपावली के पूर्व हम सभी अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं, यह अच्छी बात है, लेकिन सफाई के नाम पर अपने घर का कचरा दूसरों के दरवाजे या गलियों में डालना उचित नहीं है। जैसी स्वच्छता हमें पसंद है, वैसी ही दूसरों को भी पसंद है। सरकार भी सूखे और गीले कचरे को अलग-अलग एकत्र करने तथा स्वच्छता बनाए रखने के लिए जागरूक कर रही है। हमें भी अपने आसपास स्वच्छता रखने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए। सरस्वती और लक्ष्मी दोनों का निवास स्वच्छता में ही होता है। उन्होंने कहा कि जीवन में छवि सुधारने का अर्थ केवल चेहरे को सुंदर बनाना, अच्छे वस्त्र पहनना या बाहरी सजावट करना नहीं है। वास्तविक छवि हमारे चरित्र से बनती है।

खोओ गुण में खो सको, धन में खोना व्यर्थ

आचार्य भगवंत हमेशा शुद्ध उच्चारण के साथ शुद्ध आचरण पर भी जोर देते हैं, क्योंकि हमारा चरित्र ही भविष्य सुनिश्चित करता है। गुरुवर की वाणी हैकृ‘धोओ मन को धो सको, तन को धोना व्यर्थ। खोओ गुण में खो सको, धन में खोना व्यर्थ।’ तन की सफाई के साथ मन की सफाई भी जरूरी है। यदि मन में राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायें विद्यमान हैं तो बाहरी स्वच्छता पर्याप्त नहीं हो सकती। मुनि श्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि एक गांव के कुएं में पानी से दुर्गंध आने लगी। ग्रामीण साधु के पास पहुंचे और पानी शुद्ध करने का उपाय पूछा। साधु ने बताया कि जब तक कुएं में गिरे मरे हुए कुत्तों को बाहर नहीं निकाला जाएगा और पानी को स्वच्छ नहीं किया जाएगा, तब तक पानी शुद्ध नहीं होगा।

अर्जित संपत्ति का विवेकपूर्वक सदुपयोग करें

इसी प्रकार जब तक हमारे भीतर क्रोध, मान, माया और लोभ रूपी चार कषायें विद्यमान रहेंगी, तब तक चेतना निर्मल नहीं हो सकती। आत्मा की शुद्धि का उपाय कषायों को कृश करना, उन्हें जीतना और उनके वशीभूत न होना है। इसके लिए नियमित स्वाध्याय, धर्म का ज्ञान और सम्यक पुरुषार्थ आवश्यक है। उन्होंने कहा कि धन कमाना बुरा नहीं है, लेकिन धन में ही जीवन को खो देना व्यर्थ है। मनुष्य धन-धन करते हुए एक दिन संसार से चला जाता है और धन यहीं रह जाता है। इसलिए आवश्यकता के अनुसार संग्रह करें तथा अर्जित संपत्ति का विवेकपूर्वक सदुपयोग करें। परिवार, बच्चों और समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए धन का उचित उपयोग करना चाहिए। अर्थ का सदुपयोग उसे अनर्थ से बचाता है, जबकि उसका दुरुपयोग अनर्थ का कारण बन जाता है।

सबसे पहले धर्म को महत्व दें

महत्वपूर्ण यह नहीं कि धन कितना है, बल्कि यह है कि उसके उपयोग में हमारी बुद्धि और विवेक कैसा है। मुनि श्री ने जीवन के चार पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की व्याख्या करते हुए कहा कि गृहस्थ जीवन में इन चारों का संतुलन आवश्यक है। सबसे पहले धर्म को महत्व दें, फिर अर्थ अर्जित करें, परिवार के साथ सुख-सुविधाओं का उचित उपभोग करें और अंत में विरक्ति का भाव रखते हुए मोक्ष के लिए पुरुषार्थ करें। यदि जीवन में किसी एक पुरुषार्थ को ही महत्व दिया जाएगा तो जीवन असंतुलित हो सकता है। गृहस्थ को परिवार और सामाजिक दायित्वों के साथ धर्म तथा मोक्ष की भावना भी बनाए रखनी चाहिए, जबकि गृहत्यागी साधक का जीवन मुख्य रूप से धर्म और मोक्ष के पुरुषार्थ के लिए समर्पित रहता है।

धर्म की बातों को समझें और जीवन में स्वीकार करें

उन्होंने कहा कि प्रतिदिन स्वाध्याय करें, धर्म की बातों को समझें और उन्हें जीवन में स्वीकार करें। पूजा-पाठ, सामायिक और धार्मिक क्रियाओं का वास्तविक उद्देश्य मन में शांति तथा निराकुलता उत्पन्न करना है। बाहरी कार्य करते हुए भी भीतर शांति का भाव बना रहे, यही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मन की स्वच्छता, कषायों पर नियंत्रण, धन का सदुपयोग