कलिंजरा। आर्यिका सिद्ध श्री माताजी ने प्रात:कालीन बेला में मंगल प्रवचन में श्रावको को देश व्रत की मर्यादा, संयमित जीवन और अपध्यान से बचने का महत्वपूर्ण संदेश दिया। प्रवचन में माताजी ने पंडित दौलतराम के ग्रंथ का संदर्भ देते हुए बताया कि दिग्व्रत के बाद देशव्रत में अपने आने-जाने की सीमा निश्चित की जाती है। व्यक्ति को ग्राम, गली, घर, बाजार, बगीचे तथा अन्य स्थानों तक जाने की मर्यादा सोच-समझकर निर्धारित करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मर्यादा ऐसी हो, जिससे अनावश्यक आवागमन और नियमों में अतिचार की स्थिति न बने।

नियम जीवन को अनुशासित करने का माध्यम

उन्होंने श्रावकों को छोटे-छोटे नियम अपनाने के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि एक दिन में कितने लोगों से बात करनी है, कितने घरों में जाना है, कितनी देर बातचीत करनी है या किस सीमा तक घूमने जाना है। इनका भी संयमपूर्वक निर्धारण किया जा सकता है। नियम जीवन को अनुशासित करने और धर्म की ओर बढ़ाने का माध्यम है। प्रवचन में माताजी ने चार प्रकार के ध्यान, आर्त, रौद्र, धर्म और शुक्ल ध्यान का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल मंदिर में बैठ जाना ही धर्म ध्यान नहीं है। यदि मन में किसी के प्रति दुख, द्वेष, ईर्ष्या या बुरा सोचने के भाव चल रहे हैं, तो स्थान भले ही धार्मिक हो, लेकिन परिणाम आर्त या रौद्र ध्यान के हो सकते हैं।

नुकसान की भावना गलत परिणामों को जन्म देती है

माताजी ने उदाहरण देते हुए समझाया कि दूसरे का बुरा सोचने से दूसरे का नहीं, स्वयं का नुकसान होता है। कर्म के सिद्धांत को समझाते हुए उन्होंने कहा कि किसी के सुख को देखकर ईर्ष्या करने के बजाय उसके सुख में प्रसन्न होना चाहिए। व्यापारी के उदाहरण से उन्होंने समझाया कि पड़ोसी की दुकान पर अधिक ग्राहक देखकर ईर्ष्या या नुकसान की भावना रखना गलत परिणामों को जन्म देती है। माताजी ने कहा कि मनुष्य को अपने मन, वचन और काय से किसी का बुरा न हो, ऐसी भावना रखनी चाहिए। दूसरे का बुरा सोचने वाला दूसरे का बुरा नहीं कर पाता, बल्कि स्वयं का बुरा करता है।

भगवान से शिकायत न कर अपने कर्मों की करें आलोचना

माताजी ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि भगवान के चरणों में बैठकर शिकायत करने के बजाय अपने कर्मों की आलोचना करें और पवित्र परिणाम रखें। बाहुबली भगवान के चरणों जैसे पवित्र स्थानों में समय बिताने तथा धार्मिक गतिविधियों में मन लगाने से परिणामों की विशुद्धि बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। प्रवचन के अंत में माताजी ने कहा कि दूसरों के प्रति शुभ भावना रखिए, ईर्ष्या और द्वेष से बचिए तथा जीवन में छोटे-छोटे संयम के नियम अपनाइए। यही आत्म कल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग है।