कुण्डलपुर (म.प्र.)। कुण्डलपुर अतिशय क्षेत्र में बड़े बाबा के दरबार में निर्यापक श्रमण मुनिश्री समतासागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में केवल किसी को स्थान देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस स्थान को ग्रहण करने वाले के भीतर भी विनय, लघुता और समर्पण का भाव होना चाहिए। बड़ों में उदारता और छोटों में लघुता का भाव हो तो संबंधों में मधुरता आती है और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
दूध और पानी से समझाया विनय का भाव
मुनिश्री ने दूध और पानी का उदाहरण देते हुए कहा कि दूध जब गर्म होता है तो उसमें मिला पानी पहले जलता है। दूध अपने मित्र पानी को जलता देखकर उफनकर अग्नि को बुझाने का प्रयास करता है। जैसे ही पानी पुनः दूध में मिल जाता है, दूध शांत हो जाता है
इसके विपरीत तेल पानी में मिलकर अपना अस्तित्व नहीं छोड़ता, बल्कि पानी के ऊपर ही रहता है। उन्होंने कहा कि यही अंतर विनय और अहंकार के भाव को समझाता है। जो व्यक्ति आश्रय पाकर भी अपनी लघुता और समर्पण को बनाए रखता है, वह संबंध को सार्थक बनाता है।
गुरु-शिष्य संबंध में विनय आवश्यक
मुनिश्री ने कहा कि गुरु कभी शिष्य से यह अपेक्षा नहीं रखते कि शिष्य उन्हें नमस्कार करे, लेकिन शिष्य के भीतर गुरु के प्रति विनय होना आवश्यक है। शिष्य वही है जो अपने गुरु को केवल गुरु नहीं, बल्कि गुरुतर और महानतम मानकर चलता है। उन्होंने कहा कि गुरु का उद्देश्य सम्मान प्राप्त करना नहीं, बल्कि शिष्य के आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करना है।
जैन शासन के प्रतिनिधि हैं गुरु
मुनिश्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि आचार्य और गुरु स्वयं को सर्वेसर्वा नहीं मानते। वे जैन शासन के प्रतिनिधि हैं। उनका उद्देश्य भगवान महावीर द्वारा बताए गए मोक्षमार्ग को आगे बढ़ाना और अधिक से अधिक जीवों को आत्मकल्याण की दिशा में प्रेरित करना है।
अहंकार और आग्रह को बाहर छोड़ें
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि गुरु और जिनालय के दरबार में आने से पहले अपने अहंकार, आग्रह और अपेक्षाओं को बाहर छोड़ देना चाहिए। जिस प्रकार मंदिर में प्रवेश करने से पहले पैरों के जूते उतार दिए जाते हैं, उसी प्रकार मन के अहंकार और आग्रह को भी वहीं छोड़ देना चाहिए।
व्यक्ति जितना खाली और निष्कपट होकर धर्म के दरबार में आएगा, उतना ही आत्मकल्याण के ज्ञान और साधना से समृद्ध होकर लौटेगा।
उदारता और लघुता से सार्थक होता है धर्म
मुनिश्री ने कहा कि “बड़ों में उदारता और छोटों में लघुता का भाव—यही मोक्षमार्ग की आधारभूमि है।” उदार हृदय व्यक्ति दूसरों को स्थान देता है और विनम्र व्यक्ति उस स्थान का सम्मान करता है। दोनों भाव मिलकर धर्म, गुरु-शिष्य परंपरा और आत्मकल्याण को सार्थक बनाते हैं।
चातुर्मास से बढ़ रही धर्म प्रभावना
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि बड़े बाबा और छोटे बाबा का अपना अतिशय है। साथ ही इस वर्ष विद्या शिरोमणि आचार्य श्री समयसागर जी महाराज के आशीर्वाद से वरिष्ठ निर्यापक श्रमण मुनिश्री समतासागर जी महाराज एवं मुनिश्री पवित्र सागर जी महाराज का ससंघ चातुर्मास होने से धर्म प्रभावना हो रही है।
उन्होंने बताया कि प्रतिदिन बड़ी संख्या में संपूर्ण भारत से धर्म श्रद्धालुओं का कुण्डलपुर आगमन निरंतर जारी है।
आत्मकल्याण की प्रेरणा
मुनिश्री के प्रवचन ने श्रद्धालुओं को अहंकार त्यागकर विनय, लघुता, समर्पण और उदारता के साथ धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का भाव ग्रहण किया।




