इंदौर। “यदि कोई हमें 500 रुपये से ठग ले तो हम दुखी होते हैं, लेकिन जब हम किसी दूसरे को हजारों रुपये से ठगते हैं तो खुश होते हैं। फैसला हमें करना होगा कि ठगी अच्छी है या बुरी। सिद्धांत अपने और दूसरे के लिए अलग-अलग नहीं हो सकते।” दलाल बाग में चल रहे 33वें श्रावक संस्कार शिविर के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म पर मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने हजारों श्रावकों को सरलता और ईमानदारी का संदेश देते हुए यह बात कही।
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि 16 से 25 सितंबर तक आयोजित शिविर में देशभर से आए श्रावक दशलक्षण धर्म की आध्यात्मिक और व्यावहारिक व्याख्या का लाभ ले रहे हैं।
‘ठगे जाएं तो रोना और ठग लें तो खुश होना—यह कैसा न्याय?’
मायाचारी और छल-कपट पर आत्मचिंतन कराते हुए मुनिश्री ने सवाल किया—“फैसला करो, ठगी अच्छी है या बुरी?”
उन्होंने कहा कि जब कोई हमारे साथ बेईमानी करता है तो हम उसे गलत और पाप मानते हैं, लेकिन वही काम स्वयं करने पर उसे व्यापार अथवा अपनी सफलता मानने लगते हैं। यह दोहरा मापदंड छोड़ना आवश्यक है।
मुनिश्री ने कहा कि “ठगी चाहे मैं करूं या कोई दूसरा, सिद्धांत दोनों के लिए एक ही होना चाहिए। जो व्यवहार हम अपने लिए गलत मानते हैं, वही दूसरे के साथ भी नहीं करना चाहिए।”
मन में कुछ और, व्यवहार में कुछ और नहीं
मुनिपुंगव सुधासागर जी ने कहा कि उत्तम आर्जव धर्म का सार मन, वचन और काय में एकरूपता है। व्यक्ति के भीतर कुछ और और बाहर कुछ और नहीं होना चाहिए।
छल-कपट अथवा मायाचारी से प्राप्त सफलता क्षणिक हो सकती है, लेकिन वह व्यक्ति की आत्मिक शांति को प्रभावित करती है। जीवन में सरलता का अर्थ केवल सहज दिखाई देना नहीं, बल्कि विचार, वाणी और व्यवहार में निष्कपटता लाना है।
‘दूसरों से पहले अपनी मायाचारी पहचानें’
मुनिश्री ने कहा कि धर्म का उद्देश्य केवल दूसरों की कमियां देखना नहीं है। धर्म व्यक्ति को पहले अपने भीतर झांकने और अपनी मायाचारी, छल-कपट तथा दोहरे व्यवहार को पहचानने की प्रेरणा देता है।
आर्जव धर्म की साधना तभी सार्थक होती है, जब व्यक्ति वही सिद्धांत स्वयं पर भी लागू करे, जिसकी अपेक्षा वह दूसरों से करता है।
हजारों श्रद्धालु ले रहे दशलक्षण धर्म का लाभ
धर्मसभा में चक्रवर्ती नवीन गोधा, आनंद गोधा, सपना-मनीष गोधा, अशोक डोशी, हर्ष जैन, आलोक-आकाश कोल, डॉ. जैनेन्द्र जैन, संजय पाटोदी, हुकुमचंद जैन काका, ब्रह्मचारी प्रदीप भैया, ब्रह्मचारी पारस भैया, विनोद भैया, विजय धुर्रा, भूपेंद्र जैन, कमल जैन चैलेंजर, मुक्ता जैन और सोनाली बागड़िया सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी उपस्थित रहे।
सूत्र: मन-वचन-काय की सरलता ही सच्चा आर्जव धर्म है।





