कुण्डलपुर। “धर्म की पाठशाला में हम केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि जीवन जीने का पाठ पढ़ रहे हैं। उत्तम आर्जव धर्म हमें सहज, सरल और निष्कपट जीवन जीने की प्रेरणा देता है। आर्जव का वास्तविक अर्थ विचार, वाणी और कर्म में एकरूपता है।” दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म की आराधना के अवसर पर निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने यह बात कही।
उन्होंने कहा कि पहले दिन उत्तम क्षमा क्रोध के अवसर पर भी शांत रहने और दूसरे दिन उत्तम मार्दव गुण आने पर भी विनम्र बने रहने की शिक्षा देता है। इसके बाद आर्जव धर्म जीवन से छल-कपट और कृत्रिमता हटाकर सरलता अपनाने का संदेश देता है।
मन में कुछ और, वाणी-व्यवहार में कुछ और तो वह आर्जव नहीं
मुनिश्री ने कहा कि क्षमा और मृदुता भी तभी धर्म बनती हैं, जब उनके पीछे सरल भाव हों। कोई व्यक्ति मजबूरी में क्षमा कर सकता है अथवा किसी को धोखा देने के उद्देश्य से मीठी वाणी और विनम्र व्यवहार अपना सकता है, लेकिन ऐसी कृत्रिमता धर्म नहीं है।
जब मन में कुछ, वाणी में कुछ और व्यवहार में कुछ और हो, वहां आर्जव नहीं, कुटिलता है। शांति, समता और सद्भावना के साथ मन, वचन और कर्म एक दिशा में चलें, तभी सरलता धर्म का स्वरूप लेती है।
‘आत्मा के घर में जाना है तो मुखौटे उतारने होंगे’
सांप का उदाहरण देते हुए मुनिश्री ने कहा कि सांप सामान्यतः टेढ़ा-मेढ़ा चलता है, लेकिन अपने बिल में प्रवेश करते समय सीधा हो जाता है। इसी प्रकार मनुष्य संसार में अनेक मुखौटे लगाकर चलता है और अलग-अलग परिस्थितियों में उसके अलग-अलग चेहरे दिखाई देते हैं।
उन्होंने कहा कि जब आत्मा के घर में प्रवेश करना हो तो बाहर के सभी मुखौटे उतारने पड़ेंगे। आत्मा तक पहुंचने का मार्ग सीधा है, वहां छल-कपट के लिए कोई स्थान नहीं है।
कार्तिकेयानुप्रेक्षा से समझाया आर्जव का स्वरूप
मुनिश्री ने कार्तिकेयानुप्रेक्षा ग्रंथ में आर्जव धर्म के प्रतिपादन का उल्लेख करते हुए कहा कि जो कुटिल चिंतन नहीं करता, कुटिल वचन नहीं बोलता, कुटिल आचरण नहीं करता और दूसरों के दोषों में उलझने के बजाय अपने दोषों के शुद्धीकरण का प्रयास करता है, वही आर्जव धर्म की साधना करता है।
उन्होंने कहा कि धर्म को केवल शास्त्रों में खोजने की आवश्यकता नहीं है। व्यावहारिक जीवन में जहां प्रतिदिन छल, कपट, स्वार्थ और माया से सामना होता है, वहीं अपने परिणामों में धर्म को प्रकट करना है।
‘दूसरों को फंसाने वाला स्वयं भी जाल में उलझता है’
मकड़ी के जाल का उदाहरण देते हुए मुनिश्री ने कहा कि मकड़ी सुरक्षा के लिए जाल बुनती है, लेकिन अंततः उसी जाल में उलझ जाती है। इसी तरह मनुष्य छल करके तत्काल लाभ पा सकता है, लेकिन जैन कर्म-सिद्धांत के अनुसार उस छल से होने वाला कर्मबंध उसके साथ रहता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में संकल्प होना चाहिए कि हमारी वजह से किसी को धोखा या कष्ट न पहुंचे। धोखा देना भी नहीं है, धोखा खाना भी नहीं है और धोखेबाजों से सावधान भी रहना है।
कमी दिखे तो शिकायत नहीं, सहयोग करें
शिविरार्थियों को आर्जव का व्यावहारिक पाठ पढ़ाते हुए मुनिश्री ने कहा कि किसी व्यवस्था में कमी दिखाई देने पर कार्यकर्ताओं को कोसना उचित नहीं है। कमरे की सफाई समय पर न हो, कोई व्यवस्था पूरी न हो पाए या कार्यकर्ता उपलब्ध न हो तो नाराज होने के बजाय स्वयं कुछ समय देकर सहयोग करना चाहिए।
इससे शिविरार्थी केवल व्यवस्था का लाभ लेने वाला नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था में सहयोग करने वाला कार्यकर्ता भी बनता है। सुझाव देना हो तो उचित समय पर मृदुभाषी बनकर प्रेमपूर्वक अपनी बात रखनी चाहिए।
धर्म ‘फास्ट रिलीफ’ नहीं, आत्मशुद्धि की साधना
मुनिश्री ने कहा कि आज मनुष्य हर चीज का तत्काल परिणाम चाहता है। यह ‘फास्ट रिलीफ’ वाली मानसिकता धर्म में भी दिखाई देने लगी है, जबकि धर्म का उद्देश्य केवल तत्काल सुख-संपत्ति प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि है।
क्षमा, मार्दव और आर्जव आत्म-संशोधन के पड़ाव हैं। दशलक्षण पर्व का प्रत्येक दिन अपने भीतर एक दोष कम करने और एक सद्गुण बढ़ाने का अवसर देता है।
उन्होंने कहा कि छोटा बच्चा सहज और सरल होता है, लेकिन धीरे-धीरे अपने-पराए का भेद, स्वार्थ और माया बढ़ने लगती है। आर्जव धर्म इसी कुटिलता से बाहर निकलकर अपनी मूल सहजता की ओर लौटने का आह्वान है।
‘क्या करना है और क्या नहीं’—स्वयं करें अपने आचरण की जांच
मुनिश्री ने कहा कि यदि जीवन में ‘किं करणीयम्, किं अकरणीयम्’—क्या करना है और क्या नहीं करना है का सूत्र उतर जाए तो दशलक्षण धर्म का सार व्यवहार में आ सकता है।
व्यक्ति अपने विचार, वाणी और कर्म की स्वयं जांच करे और आत्म-अनुशासन विकसित करे। जो भीतर से अनुशासित हो जाता है, उसे बार-बार बाहरी निर्देशों की आवश्यकता नहीं पड़ती।
पुष्पदंत भगवान के निर्वाण कल्याणक पर चढ़ेगा निर्वाण लाडू
समता सरोवर के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं कुण्डलपुर तीर्थ प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि दशलक्षण महापर्व के दौरान कुण्डलपुर में अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, स्वाध्याय एवं धर्म आराधना के माध्यम से श्रद्धालु आत्मशुद्धि की साधना कर रहे हैं।
शनिवार को अष्टमी के अवसर पर जैन धर्म के नवमें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत के निर्वाण कल्याणक महोत्सव में श्रद्धाभाव से निर्वाण लाडू अर्पित किया जाएगा। दोपहर में तत्त्वार्थ सूत्र स्वाध्याय कक्षा तथा सायंकाल आचार्य भक्ति, समता समाधान, आरती एवं नाटिका के कार्यक्रम संपन्न हुए।





