मुरैना/अम्बाह। दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन अम्बाह जैन बगीची में आचार्य श्री सिद्धांत सागर महाराज की शिष्या गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री संगममति माताजी ससंघ के पावन सान्निध्य में उत्तम आर्जव धर्म की श्रद्धा एवं भक्तिभावपूर्वक आराधना की गई।
इस अवसर पर संगीतमय अभिषेक, शांतिधारा, पूजन एवं मंत्रोच्चार के साथ धार्मिक कार्यक्रम संपन्न हुए। महिला-पुरुषों एवं बच्चों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता कर धर्मलाभ लिया।
‘मन में जो हो, वही वाणी और आचरण में दिखाई दे’
आर्यिका श्री संगममति माताजी ने उत्तम आर्जव धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि मन, वचन और काया में सरलता, निष्कपटता एवं एकरूपता होना ही उत्तम आर्जव धर्म है।
उन्होंने कहा कि आर्जव का अर्थ सीधापन है। मन में जो विचार हों, वही वाणी में आएं और उसी के अनुरूप हमारा आचरण भी होना चाहिए। जीवन में छल-कपट, दिखावा और पाखंड से बचना आर्जव धर्म की साधना है।
मायाचारी का त्याग आर्जव धर्म का प्रमुख आधार
माताजी ने कहा कि मायाचारी अर्थात छल-कपट और धोखे का त्याग उत्तम आर्जव धर्म का प्रमुख आधार है। सरलता और निष्कपटता अपनाने से व्यक्ति के आचरण और भावों में शुद्धता आती है।
उन्होंने कहा कि कुटिलता व्यक्ति को उसकी स्वाभाविक सरलता से दूर करती है, जबकि आर्जव धर्म अपने विचारों और व्यवहार को सहज एवं निष्कपट बनाने की प्रेरणा देता है।
आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग से जुड़ा है आर्जव
आर्यिका संगममति माताजी ने कहा कि जैन दर्शन में उत्तम आर्जव धर्म को आत्मकल्याण एवं मोक्षमार्ग की साधना से जोड़ा गया है। कुटिलता का त्याग कर सरल और पवित्र भावों के साथ धर्माराधना करना ही इस धर्म का सार है।
रात्रि में आरती और सांस्कृतिक कार्यक्रम
दशलक्षण महापर्व के दौरान जैन बगीची में प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। रात्रि में आरती, लकी ड्रॉ एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में श्रद्धालु उत्साहपूर्वक सहभागिता कर रहे हैं।





