इंदौर। विद्या सुधा देशना मंडप में तीर्थ चक्रवर्ती निर्यापक मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य के भीतर अपार शक्ति है, लेकिन जब वह अपनी सोच और सामर्थ्य को केवल निजी स्वार्थ तक सीमित कर लेता है तो उसकी व्यापक संभावनाएं संकुचित हो जाती हैं।
गांधारी दृष्टि से बचने का संदेश
मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने महाभारत के गांधारी प्रसंग का उदाहरण देते हुए कहा कि किसी एक व्यक्ति के मोह में अपनी पूरी दृष्टि केंद्रित कर देना उचित नहीं है। परिवार से प्रेम करना गलत नहीं, किंतु परिवार के मोह में सत्य, न्याय और दूसरों के हितों की उपेक्षा करना संकुचित दृष्टि है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपनी दृष्टि व्यापक बनाकर समाज और समस्त जीवों के कल्याण की भावना रखनी चाहिए।
स्वार्थ से बदलते हैं संबंध
गुरुदेव ने कहा कि संसार के कई संबंध अपेक्षाओं से जुड़े होते हैं। अपेक्षाएं पूरी होने तक व्यवहार मधुर रहता है, किंतु अपेक्षाएं टूटने पर संबंधों का स्वरूप बदल जाता है। माता-पिता जीवनभर संतान के लिए समर्पित रहते हैं, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यवहार और दायित्वों पर आत्मचिंतन करना चाहिए।
गृहस्थ और साधु की दृष्टि का अंतर
उन्होंने कहा कि गृहस्थ और साधु दोनों के पास वही आंखें, कान और मस्तिष्क हैं, अंतर केवल संकल्प एवं उद्देश्य का है। गृहस्थ का चिंतन प्रायः अपने परिवार तक सीमित रहता है, जबकि साधु समस्त जीवों के कल्याण की भावना रखता है।
गुरुदेव ने भगवान महावीर के आदर्शों से प्रेरणा लेने का संदेश देते हुए कहा कि हमारी आंखें, वाणी, विचार और धन दूसरों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के माध्यम बन सकते हैं। धन की सार्थकता उसके विवेकपूर्ण और परोपकारी उपयोग में है।
धर्मसभा में संजय पाटोदी, नवीन आनंद गोधा, सपना-मनीष गोधा, अशोक डोशी, हर्ष जैन, आकाश कोयला, प्रिंसपाल टोंग्या, राहुल सेठी, डॉ. जैनेन्द्र जैन, राजेंद्र नायक एवं भूपेंद्र भोपाली सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।
श्रीफल साथी : राजेश जैन दद्दू, इंदौर





