विश्व युवा दिवस केवल युवाओं की ऊर्जा, उत्साह और सामर्थ्य का उत्सव नहीं है, बल्कि यह उस प्रश्न पर विचार करने का अवसर भी है कि आज का युवा किस दिशा में आगे बढ़ रहा है और उसके जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है। युवा किसी भी राष्ट्र की केवल जनसंख्या का एक हिस्सा नहीं होता, वह राष्ट्र की चेतना, संस्कृति, विचार और भविष्य का निर्माता होता है। जिस देश का युवा जागृत, संस्कारित, चरित्रवान और अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित होता है, उस देश को आगे बढ़ने से कोई शक्ति रोक नहीं सकती।

महावीर का यह दर्शन और भी प्रासंगिक हो जाता है

भारत की युवा चेतना की जड़ें आधुनिक युग से कहीं अधिक गहरी हैं। यह भूमि भगवान महावीर की तपस्या, त्याग, अहिंसा और आत्मविजय की भूमि है। भगवान महावीर ने संसार को यह संदेश दिया कि सबसे बड़ी विजय किसी दूसरे व्यक्ति, समाज या राष्ट्र पर विजय प्राप्त करना नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर छिपे क्रोध, मान, माया और लोभ पर विजय प्राप्त करना है। आज जब युवा बाहरी सफलता की दौड़ में स्वयं को भूलता जा रहा है, तब महावीर का यह दर्शन और भी प्रासंगिक हो जाता है।

सहिष्णुता ही स्वस्थ समाज की आधारशिला

भगवान महावीर ने युवाओं को कोई कमजोर, पलायनवादी या निष्क्रिय जीवन नहीं दिया। उन्होंने तो आत्मबल का ऐसा मार्ग दिखाया जिसमें मनुष्य अपने भीतर की शक्तियों को पहचानकर स्वयं का स्वामी बनता है। अहिंसा उनके लिए केवल किसी जीव को चोट न पहुंचाने का नाम नहीं थी, बल्कि विचार, वाणी और व्यवहार में करुणा तथा संयम स्थापित करने का नाम थी। अनेकांत ने हमें सिखाया कि सत्य को देखने के अनेक दृष्टिकोण हो सकते हैं और सहिष्णुता ही स्वस्थ समाज की आधारशिला है।

बड़ी समस्या साधनों की कमी नहीं, बल्कि स्वयं से दूरी

महावीर की इसी आत्मजागरण की परंपरा को आचार्य कुंदकुंद देव ने दार्शनिक गहराई प्रदान की। आचार्य कुंदकुंद का चिंतन मनुष्य को बाहर की दुनिया जीतने से पहले अपने भीतर उतरने की प्रेरणा देता है। समयसार जैसे महान ग्रंथों के माध्यम से उन्होंने आत्मा और उसके शुद्ध स्वरूप का बोध कराया। उनका संदेश आज के युवा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि आधुनिक जीवन में सबसे बड़ी समस्या साधनों की कमी नहीं, बल्कि स्वयं से दूरी है।

भीतर की दुनिया से अपरिचित

आज का युवा मोबाइल की स्क्रीन पर पूरी दुनिया देख रहा है, लेकिन कई बार अपने भीतर की दुनिया से अपरिचित है। उसके पास सूचना बहुत है, परंतु आत्मज्ञान कम होता जा रहा है। उसके पास संपर्कों की संख्या बहुत है, लेकिन आत्मीयता का अभाव दिखाई देता है। उसके पास बोलने के लिए अनेक मंच हैं, लेकिन स्वयं को सुनने के लिए समय नहीं है। ऐसे समय में आचार्य कुंदकुंद का आत्मदर्शन युवा को भीतर लौटने का निमंत्रण देता है।

समाज तथा राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व हो

भारतीय संत परंपरा ने सदैव कहा है कि मनुष्य की वास्तविक शक्ति उसके बाहुबल में नहीं, आत्मबल में होती है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में युवा का अर्थ केवल उम्र से नहीं लगाया गया। युवा वह है जिसके भीतर नवीन विचार हों, जिसके चरित्र में दृढ़ता हो, जिसके कर्म में पवित्रता हो और जिसके जीवन में समाज तथा राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व हो।

त्याग, तपस्या, संयम, स्वावलंबन जरूरी

इसी महान परंपरा की आधुनिक कड़ी के रूप में परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज का जीवन हमारे सामने एक विराट आदर्श बनकर उपस्थित होता है। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपने जीवन से यह प्रमाणित किया कि आधुनिक युग में भी त्याग, तपस्या, संयम, स्वावलंबन और भारतीय संस्कृति को सर्वाेच्च स्थान देकर जीवन जिया जा सकता है।

श्रम छोटा नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता का आधार

उनका जीवन केवल धार्मिक अनुकरण का विषय नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी के लिए एक सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय संदेश भी है। उन्होंने युवाओं को केवल उपदेश नहीं दिए, बल्कि अपने आचरण से बताया कि सादगी कमजोरी नहीं, शक्ति है; संयम बंधन नहीं, स्वतंत्रता है; श्रम छोटा नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता का आधार है और मातृभाषा तथा भारतीय संस्कृति से जुड़ना पिछड़ापन नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ी हुई आधुनिकता है।

आज युवा के सामने इंटरनेट है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता है

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का चिंतन हमें यह याद दिलाता है कि जिस राष्ट्र का युवा अपनी भाषा, संस्कृति, संस्कार और इतिहास से कट जाता है, वह आर्थिक रूप से आगे बढ़कर भी अपनी आत्मा को खो सकता है। इसलिए भारत के युवा के सामने केवल करियर बनाने की चुनौती नहीं है; उसके सामने चरित्र बनाने की भी चुनौती है।

आज युवा के सामने इंटरनेट है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता है, विज्ञान है, अंतरिक्ष की संभावनाएं हैं, स्टार्टअप हैं, उद्योग हैं और विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के असंख्य अवसर हैं। लेकिन इन सबके बीच एक प्रश्न लगातार खड़ा हैकृक्या हमारी प्रगति के साथ हमारा विवेक भी बढ़ रहा है?

राष्ट्र तथा मानवता के कल्याण में अपना जीवन लगाए

यदि तकनीक हमारे हाथ में है, लेकिन विवेक हमारे भीतर नहीं है, तो तकनीक वरदान के बजाय संकट बन सकती है। यदि शिक्षा हमारे पास है, लेकिन संस्कार नहीं हैं, तो ज्ञान अहंकार को जन्म दे सकता है। यदि धन हमारे पास है, लेकिन संवेदना नहीं है, तो समृद्धि समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ सकती है। भगवान महावीर ने आत्मसंयम दिया, आचार्य कुंदकुंद ने आत्मदर्शन दिया और आचार्य विद्यासागर जी महाराज ने आधुनिक समय में आत्मसंयम, संस्कृति, स्वावलंबन और सामाजिक उत्तरदायित्व को अपने जीवन में साकार करके दिखाया। इन तीनों की विचारधारा को एक सूत्र में पिरोएं तो संदेश स्पष्ट हैकृयुवा पहले स्वयं को जीते, फिर समाज को दिशा दे और अंततः राष्ट्र तथा मानवता के कल्याण में अपना जीवन लगाए।

सार्थक होने का संस्कार देना चाहिए

विश्व युवा दिवस पर हमें युवाओं को केवल नौकरी पाने की प्रेरणा नहीं देनी चाहिए, बल्कि उन्हें योग्य बनने की प्रेरणा देनी चाहिए। केवल सफल होने की शिक्षा नहीं, सार्थक होने का संस्कार देना चाहिए। केवल प्रतियोगिता में आगे निकलने की इच्छा नहीं, बल्कि किसी पीछे छूटे व्यक्ति का हाथ पकड़ने की संवेदना भी देनी चाहिए।

आज आवश्यकता ऐसे युवाओं की है जो विज्ञान में आगे हों और संस्कारों में भी; तकनीक में दक्ष हों और प्रकृति के प्रति संवेदनशील भी; आधुनिक विचारों के समर्थक हों लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े भी; अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों और अपने कर्तव्यों के प्रति भी उतने ही सजग हों।

वे अतीत से शक्ति लेकर भविष्य का निर्माण करें

भारत की युवा शक्ति यदि भगवान महावीर की अहिंसा और आत्मविजय, आचार्य कुंदकुंद के आत्मदर्शन और आचार्य विद्यासागर जी महाराज के संयम, स्वावलंबन, संस्कार तथा राष्ट्रहित के संदेश को अपने जीवन में उतार ले, तो भारत केवल दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया को दिशा देने वाली युवा शक्ति का राष्ट्र बन सकता है। हमें अपने युवाओं से यह नहीं कहना है कि वे अतीत में लौट जाएं। हमें उनसे कहना है कि वे अतीत से शक्ति लेकर भविष्य का निर्माण करें। विज्ञान अपनाएं, लेकिन विवेक के साथ। आधुनिकता अपनाएं, लेकिन अपनी पहचान खोकर नहीं। प्रतिस्पर्धा करें, लेकिन मानवीयता को पीछे छोड़कर नहीं। सफलता प्राप्त करें, लेकिन सफलता के साथ संस्कार भी अर्जित करें।

युवा केवल नौकरी खोजने वाला युवा न बने

क्योंकि भारत का भविष्य केवल संसद, विधानसभाओं, विश्वविद्यालयों, उद्योगों और तकनीकी संस्थानों में नहीं लिखा जाएगा। भारत का भविष्य करोड़ों युवाओं के चरित्र में लिखा जाएगा। विश्व युवा दिवस पर यही संकल्प होना चाहिए कि हमारा युवा केवल नौकरी खोजने वाला युवा न बने, बल्कि रोजगार देने वाला बने; केवल अपने अधिकार मांगने वाला नागरिक न बने, बल्कि अपने कर्तव्यों को निभाने वाला नागरिक बने; केवल सोशल मीडिया पर विचार व्यक्त करने वाला युवा न बने, बल्कि अपने आचरण से विचारों को जीवंत करने वाला युवा बने।

जब युवा स्वयं को जीत लेता

भगवान महावीर से लेकर आचार्य कुंदकुंद और आचार्य विद्यासागर जी महाराज तक चली यह महान परंपरा हमें यही सिखाती है कि मनुष्य का सबसे बड़ा अभियान बाहर की दुनिया को बदलना नहीं, पहले स्वयं को बदलना है। जब युवा स्वयं को जीत लेता है तो परिवार बदलता है, परिवार बदलता है तो समाज बदलता है, समाज बदलता है तो राष्ट्र बदलता है और जब राष्ट्र अपनी आत्मा को पहचान लेता है, तब वह पूरी मानवता को नई दिशा देने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।

यही महावीर की विरासत है

विश्व युवा दिवस पर यही हमारा संदेश हैकृयुवा जागे, स्वयं को पहचाने, अपनी संस्कृति से जुड़े, चरित्रवान बने, राष्ट्र के प्रति समर्पित हो और मानवता के कल्याण का संकल्प लेकर आगे बढ़े। यही महावीर की विरासत है, यही कुंदकुंद का आत्मदर्शन है और यही आचार्य विद्यासागर जी महाराज के जीवन का अमर संदेश है।

आलेख -डॉ. जयेंद्रकुमार जैन ‘निप्पू’ चंदेरी