मुरैना। नगर के बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्यश्री विद्यासागर महाराज, आचार्यश्री अभिनंदन सागरजी महाराज के परम प्रभावक शिष्य आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने कहा कि वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी ही सच्चे देव कहलाते हैं। सच्चे देव के प्रति केवल आस्था और श्रद्धा रखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके स्वरूप और उपदेश पर दृढ़ विश्वास होना चाहिए। यही दृढ़ श्रद्धा आगे चलकर सम्यकदर्शन का आधार बनती है। आचार्यश्री ने कहा कि व्यक्ति जिस पर विश्वास करता है, उसका प्रभाव उसके आचरण में भी दिखाई देना चाहिए। केवल शब्दों में श्रद्धा और व्यवहार में संदेह हो तो वह सच्ची श्रद्धा नहीं कही जा सकती।

सच्चा विश्वास केवल मन में नहीं, आचरण में भी दिखाई दे

उन्होंने एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक गांव में लंबे समय तक वर्षा नहीं हुई। गांववासी पंडितजी के पास पहुंचे और वर्षा के लिए सामूहिक प्रार्थना करने की बात कही। जब सभी लोग एकत्रित हुए तो पंडितजी ने कहा कि वर्षा नहीं होगी, क्योंकि किसी को विश्वास ही नहीं है। यदि वास्तव में विश्वास होता तो कोई न कोई छाता लेकर अवश्य आता। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने समझाया कि सच्चा विश्वास केवल मन में नहीं, हमारे आचरण में भी दिखाई देना चाहिए।

आचार्यश्री ने प्रेरक प्रसंग से समझाया

आचार्यश्री ने बीरबल और बादशाह का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि बादशाह ने जब बैंगन की सब्जी को अच्छा बताया तो बीरबल ने भी उसे अच्छा कहा। कुछ समय बाद बादशाह ने उसी बैंगन को खराब बताया तो बीरबल ने भी अपनी सहमति जता दी। कारण पूछने पर बीरबल ने कहा-“हुजूर! मैं बैंगन का नहीं, आपका विश्वासपात्र हूं।”

आस्था के साथ धर्म मार्ग पर आगे बढें

आचार्यश्री ने कहा कि हमारी श्रद्धा भी स्वार्थ, सुविधा और परिस्थितियों के अनुसार बदलने वाली नहीं होनी चाहिए। सच्चे देव के वीतराग स्वरूप को समझकर उनके प्रति जो अडिग श्रद्धा उत्पन्न होती है, वही सम्यकदर्शन की दिशा में पहला कदम है। इसलिए श्रद्धावान श्रावक को देव, शास्त्र और गुरु के वास्तविक स्वरूप को समझकर दृढ़ आस्था के साथ धर्म मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।