इंदौर। दलाल बाग परिसर की धर्म सभा में मंगलवार को मुनि पुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने कहा कि जिन कार्यों के लिए जैन बनना जरूरी है, उसे इसी भव में कर लेना चाहिए क्योंकि अजैन होने पर श्रावक संस्कार शिविर जैसा दुर्लभ अवसर नहीं मिल पाता और यह कमी जीव को हमेशा खलती है। महाराज श्री ने कहा कि पंचम काल में कोई अरिहंत नहीं बनता फिर हम क्यों मुनि बने? हम रत्नत्रय धारण करने के लिए मुनि बने हैं। मनुष्य पर्याय में दिगंबर बनने के लिए मुनि बनना पड़ेगा, ताकि अगले भव में विदेह क्षेत्र में भी मुनि बन सकूँ। उन्होंने कहा, गुरुदेव के पास कितने ही लोग मुनि बनने आते थे पर गुरुदेव कहते थे- अभी आप में अयोग्यता है। यही अयोग्यता अगले भव में मुनि बनने की प्रेरणा देती रहेगी। गुरुदेव ने सीख देते हुए कहा कि गुरु का व्यवहार शत्रु जैसा होता है।

फोकट में शांतिधारा और कलश क्यों लेना?

समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि महाराज श्री ने लौकिक व्यवस्था का उदाहरण देते हुए कहा कि 99 नंबर लाने वाले को 1 नंबर नहीं बढ़ाया जाता पर 23 नंबर लाने वाले को 10 नंबर ग्रेस देकर पास कर दिया जाता है। मेरी भी यही धारणा है - फोकट में शांतिधारा और कलश क्यों लेना? गुरु कृपा से फोकट फ्री में मत लो। समर्थ बनो, बोली से प्राप्त करो। मेरा आशीर्वाद है कि इस बार नहीं तो अगली बार 100 नंबर लेकर आओ। जैसे राजा चंद्रगुप्त को उनके गुरु चाणक्य पूरा हुनर सिखाते थे, पर विपत्ति के समय सहयोग नहीं करते थे। गुरु व्यवहार शत्रु जैसा होता है, शिष्य के गिरने पर भी उठाते नहीं, पर ऐसी कला सिखाते हैं कि गिरने के बाद कैसे उठा जाए, वही सच्चा गुरु है।

कौन सा पिता श्रेष्ठ है?*

एक पिता इतना कमा कर रख देता है कि न भी कमाओ तो वसीयत तेरी है, और एक पिता योग्य बना देता है कि कमाने की कला क्या है। बताइए कौन सा पिता सर्वश्रेष्ठ है? बाप की संपत्ति और वसीयत पर नजर डालने वालों, वसीयत से जिंदगी की किस्मत नहीं लिखी जाती, उड़ान बताएगी कि आसमान किसका है। गुरु कृपा के 10 नंबर लेकर पास तो हो जाओगे, पर नौकरी कौन सी मिलेगी? अगर 99 नंबर लाए हो तो क्या बन जाओगे? पिताजी से, भगवान से, गुरु से कृपा नहीं, कला सीखो। पिताजी से पैसा और इज्जत कैसे कमाना है वो सीखो, गुरु से साधना-तपस्या और संकट से बचने की कला सीखो।

आज के प्रवचन का सार - 5 सूत्र

1. वसीयत से किस्मत नहीं लिखी जाती, उड़ान बताएगी आसमान किसका है।

2. पिताजी, भगवान और गुरु से कृपाण नहीं, कला सीखो।

3. गुरु का व्यवहार शत्रु जैसा होता है, पर वही गिर कर उठना सिखाता है।

4. सोचो - कौन से कार्य हैं जो शिविर में बैठे बिना नहीं हो सकते, कौन से कार्य जैनी बने बिना नहीं हो सकते।

5. सौधर्म इंद्र-इंद्राणी बनने के लिए, भगवान के माता-पिता बनने के लिए और मेरे बाद भी इस घर में साधु-संतों का आहार होता रहे, इसलिए मैंने शादी की हैधर्म सभा में समाज श्रेष्ठी आकाश आलोक कोल, आनंद नवीन गोधा, हर्ष जैन, हुक्मकाका शेलेष जैन विजय धुर्रा कमल जैन चैलेंजर अरविंद अखिलेश सोंधिया आदि उपस्थित थे।