प्रकृति के विनाश से पुनर्विकास और फिर आत्मशुद्धि की ओर बढ़ने की धार्मिक मान्यता से जुड़ी 98 दिनों की यात्रा के बाद आता है दशलक्षण पर्व। दस दिन, दस धर्म और एक लक्ष्य—अपने भीतर के विकारों को कम कर आत्मस्वरूप की ओर बढ़ना।
जब प्रकृति बदलती है, तब मनुष्य को भी बदलना चाहिए
जब मनुष्य प्रकृति के विनाश को देखता है, तो उसके भीतर भय और पीड़ा पैदा होती है। लेकिन जब वही प्रकृति फिर से हरी-भरी और सुंदर होती दिखाई देती है, तो मन में आशा और आनंद का भाव जागता है।
जैन दर्शन में काल के परिवर्तन और प्रकृति के उतार-चढ़ाव को एक व्यापक कालचक्र से जोड़ा गया है। अवसर्पिणी में सुख, आयु, बुद्धि, ऊंचाई और अनुकूल परिस्थितियों का क्रमशः ह्रास होता है, जबकि उत्सर्पिणी में सुख आदि के विकास का क्रम शुरू होता है।
इसी कालचक्र से जुड़ी धार्मिक मान्यता में 49 दिन कुवृष्टि और उसके बाद 49 दिन सुवृष्टि का वर्णन मिलता है। कुल 98 दिनों की यह यात्रा विनाश के बाद पुनर्निर्माण और अंधकार के बाद प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक बनती है।
और जब प्रकृति फिर से जीवन के योग्य बनती है, तब भाद्रपद शुक्ल पंचमी से दस दिवसीय दशलक्षण पर्व की धार्मिक परंपरा शुरू होती है।
लेकिन यह केवल प्रकृति के पुनर्विकास की कहानी नहीं है।
यह मनुष्य के भीतर भी एक नई शुरुआत का अवसर है।
क्रोध से क्षमा की ओर, अहंकार से विनम्रता की ओर, कपट से सरलता की ओर, लोभ से शुचिता की ओर और असंयम से आत्मसंयम की ओर बढ़ने की यात्रा, दशलक्षण पर्व है।
98 दिन की यात्रा : 49 दिन कुवृष्टि, 49 दिन सुवृष्टि
जैन इतिहास में कालचक्र के परिवर्तन के साथ प्रकृति में बड़े बदलावों का वर्णन मिलता है। अवसर्पिणी काल के अंत में विनाशकारी परिस्थितियों के बाद उत्सर्पिणी काल का आरंभ माना जाता है।
इस क्रम में 49 दिनों तक सात प्रकार की कुवृष्टियाँ सात-सात दिन तक होती हैं। जैन ग्रंथों में इनके नामों का वर्णन इस प्रकार मिलता है—
कुवृष्टि की सात वर्षाएँ
• तुहिन — बर्फ, हिम या ओले के समान अत्यंत शीतल पदार्थ।
• क्षार जल — क्षारीय जल की वर्षा।
• विष — विषैला पदार्थ, जो शरीर को नुकसान पहुंचाता है।
• धूम — धुआं, जो जलने से उत्पन्न होता है।
• धूल — मिट्टी या बारीक कण, जो हवा में उड़ते हैं।
• वज्र/पत्थर — कठोर प्राकृतिक शिला या चट्टान का टुकड़ा।
• अग्नि — आग, जो गर्मी और प्रकाश उत्पन्न करती है।
प्रत्येक प्रकार की वर्षा सात दिन तक होने से कुल अवधि 49 दिन मानी जाती है। ग्रंथ में वर्णन के अनुसार विष और अग्नि जैसी वर्षाओं से पृथ्वी का बड़ा भाग नष्ट और चूर्ण हो जाता है।
फिर शुरू होती है सुवृष्टि
विनाश के बाद उत्सर्पिणी काल का आरंभ माना जाता है। इसके साथ 49 दिनों तक सात प्रकार की शुभ या सुखदायक वर्षाओं का क्रम बताया गया है।
सुवृष्टि की सात वर्षाएँ
• पुष्कर मेघ (विशेष प्रकार का मेघ) — जल की वर्षा करने वाला बादल।
• क्षीर मेघ — दूध की वर्षा करने वाला बादल।
• अमृत मेघ — अमृत की वर्षा करने वाला बादल।
• रस मेघ — दिव्य एवं मधुर रस की वर्षा करने वाला बादल।
• शीतल मेघ — शीतल जल की वर्षा करने वाला बादल।
(जैन ग्रंथ में हमें पांच नाम ही मिले हैं। सर्वोषधि और सुगंधित जल वर्षा—इन दोनों नामों के बारे में भी सुनने में आया है।)
इन वर्षाओं से जली हुई पृथ्वी शीतल होती है और धीरे-धीरे वनस्पतियों, लताओं, पुष्पों और जीवन के अनुकूल वातावरण का विकास होने लगता है।
इस प्रकार 49 दिन कुवृष्टि और 49 दिन सुवृष्टि—कुल 98 दिनों की यह धार्मिक मान्यता प्रकृति के विनाश से पुनर्विकास की यात्रा को सामने रखती है।
98 दिनों का संदेश
विनाश अंतिम सत्य नहीं है।
विकास की संभावना हमेशा बनी रहती है।
यही भाव मनुष्य के जीवन पर भी लागू होता है। भीतर कितने ही विकार क्यों न हों, आत्मशुद्धि का मार्ग हमेशा खुला है।
प्रकृति के विनाश के बाद जैसे पुनर्विकास होता है, वैसे ही मनुष्य अपने भीतर के विकारों को दूर कर आत्मगुणों का विकास कर सकता है।
प्रकृति के बाद मनुष्य के भीतर विकास
98 दिनों की यह यात्रा केवल बाहरी प्रकृति के बदलने की यात्रा नहीं है। यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने और स्वयं को बदलने का संदेश भी देती है।
प्रकृति के विनाश के बाद जब जीवन के अनुकूल वातावरण तैयार होता है, तब मनुष्य के लिए भी अपने जीवन को धर्ममय और आत्मोन्मुख बनाने का अवसर सामने आता है।
यही कारण है कि 98 दिनों की इस यात्रा के बाद आने वाला दशलक्षण पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आत्मविकास की साधना का अवसर बन जाता है।
98 दिनों के बाद दस दिनों की साधना
जैन ग्रंथों के अनुसार सुवृष्टि की 49 दिनों की अवधि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी तक पूर्ण होती है। विजयार्ध पर्वत की गुफाओं में देव और विद्याधरों द्वारा सुरक्षित रखे गए 72 जोड़े अथवा संख्यात युगल मनुष्य और तिर्यंच बाहर आते हैं और इसके बाद भाद्रपद शुक्ल पंचमी से दस दिवसीय दशलक्षण पर्व की धार्मिक उत्सव की परंपरा जुड़ती है।
क्रमशः
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