मुरैना। आचार्य श्री उदारसागरजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए चारित्र धर्म के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। आचार्यश्री ने कहा कि चारित्र हमारे जीवन को उज्ज्वल बनाने का सर्वाेत्तम साधन है। जिस प्रकार दीपक स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है, उसी प्रकार चारित्रवान व्यक्ति अपने जीवन को संयम, सदाचार और आत्मानुशासन से प्रकाशित करता है। मनुष्य को अपने जीवन के कल्याण के लिए चारित्र को अपनाने में कभी आलस्य नहीं करना चाहिए। चारित्र ग्रहण करने के लिए भविष्य का इंतजार करने के बजाय वर्तमान में ही उसके प्रति जागरूक होकर पुरुषार्थ करना चाहिए। जीवन का कोई भरोसा नहीं है, इसलिए धर्म और आत्मकल्याण के कार्यों को कल पर टालना उचित नहीं है। व्यक्ति को यह नहीं सोचना चाहिए कि अभी चारित्र ग्रहण करने की पात्रता नहीं है, बल्कि अपनी वर्तमान सामर्थ्य के अनुसार संयम और सदाचार को जीवन में स्थान देना चाहिए। जीवन में छोटे छोटे नियमों का पालन करने मात्र से संयम पथ पर चलने की प्रेरणा मिलती है और चारित्र का मार्ग प्रशस्त होता है।

शास्त्र आत्मकल्याण का मार्ग बताते हैं

आचार्यश्री ने देव, शास्त्र और गुरु के प्रति श्रद्धान की महत्ता बताते हुए कहा कि प्रत्येक सम्यग्दृष्टि जीव के जीवन में इन तीनों के प्रति सच्चा विश्वास होना चाहिए। देव हमें वीतरागता का आदर्श प्रदान करते हैं, शास्त्र आत्मकल्याण का मार्ग बताते हैं और गुरु उस मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। लेकिन इनकी महत्ता को केवल सुनना और स्वीकार करना ही पर्याप्त नहीं है। इनके बताए मार्ग पर चलकर अपने जीवन में परिवर्तन लाना आवश्यक है। धर्मसभा में बैठकर प्रवचन सुनना तभी सार्थक है, जब प्रवचन से प्राप्त शिक्षा हमारे विचारों, व्यवहार और आचरण में दिखाई दे। उन्होंने कहा कि चारित्र कोई दिखावे की वस्तु नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि का साधन है। व्यक्ति के बाहरी आडंबर से अधिक महत्व उसके आंतरिक परिणामों और आचरण का है। यदि मन में राग-द्वेष, अहंकार और विषयों के प्रति आसक्ति बनी हुई है, तो केवल धार्मिक क्रियाएं करने से जीवन में वास्तविक परिवर्तन नहीं आ सकता। चारित्र का अर्थ है अपने जीवन को मर्यादित करना, बुराइयों से दूर रहना और आत्मा के हित में कार्य करना। व्यक्ति जितना अपने आचरण को शुद्ध बनाएगा, उतना ही वह आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ेगा।

चारित्र ही आत्मा को निर्मल बनाने का माध्यम

आचार्यश्री ने स्पष्ट कहा कि हमारा वास्तविक कल्याण चारित्र से ही होगा। चारित्र ऐसा अनमोल साधन है, जिसे ग्रहण किए बिना मुक्ति की प्राप्ति संभव नहीं है। इसलिए चारित्र को भविष्य पर टालने के बजाय अपनी पात्रता और सामर्थ्य के अनुसार उसे जीवन में धारण करने का प्रयास करना चाहिए। धर्म के मार्ग पर चलने के लिए किसी विशेष समय या अवसर की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। आज से ही अपने जीवन में संयम, त्याग और सदाचार का अभ्यास प्रारंभ करना चाहिए। चारित्र ही आत्मा को निर्मल बनाने और मोक्षमार्ग पर आगे बढ़ाने का सशक्त माध्यम है।

मनुष्य सामर्थ्य अनुसार करें बुराइयों का त्याग

मुनि श्री उपशांतसागरजी ने कहा कि मनुष्य के जीवन में धर्म की सार्थकता तभी है, जब वह उसके आचरण में दिखाई दे। सम्यग्दर्शन हमें सही मार्ग की पहचान कराता है, जबकि चारित्र उस मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। केवल धर्म की बातें सुनने और समझने से आत्मकल्याण नहीं होता, बल्कि अपने व्यवहार में संयम, त्याग और सदाचार अपनाना आवश्यक है। मनुष्य को अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार बुराइयों का त्याग करते हुए अच्छे आचरण की ओर कदम बढ़ाना चाहिए। चारित्र के माध्यम से ही आत्मा की शुद्धि और जीवन की वास्तविक उन्नति संभव है।

प्रवचन प्रतिदिन सुबह 9 बजे से...

कार्यक्रम में संचालन नवनीत जैन शास्त्री ने करते हुए कहा कि बड़े जैन मंदिर में विराजमान जैनाचार्यश्री उदार सागरजी महाराज ससंघ के प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 9 बजे होते हैं। सभा के शुभारंभ में मंगलाचरण रविंद्रकुमार जैन भंडारी ने प्रस्तुत किया। आचार्यश्री अभिनंदनसागर महाराज के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं चित्र अनावरण सम्मानीय जनों ने किया।