आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज के मुनि दीक्षा दिवस पर जानें उनके मोक्ष मार्ग के बारे में प्रस्तुति -तुष्टि जैनसम्यकदर्शन के ज्ञाता आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज का 21 नवंबर को 32वां मुनि दीक्षा दिवस है। इस अवसर पर जानते हैं उनके बारे में... पूर्व नाम : बा.ब्र.श्री राजेन्द्र कुमार जी जैन(लला) पिता : श्री रामनारायण जी जैन ( समाधिस्थ – मुनि श्री विश्वजीत सागर जी ) माता : श्रीमती रत्तीबाईजी जैन ( समाधिस्थ – क्षुल्लिका श्री विश्वमतिमाताजी ) जन्म स्थान : भिण्ड (म.प्र.),गृह ग्राम : रूर जन्म दिनांक: 18 दिसम्बर 1971 लौकिक शिक्षा: दसवीं भाई / बहिन : पांच 5 भाषाज्ञान : हिन्दी, संस्कृत, प्राकृत साहित्य सृजन - शताधिक आध्यात्मिक कृतियां पंचकल्याणक प्रतिष्ठा: लगभग 100 में 1 या 2 कम स्वत: ब्रहमचर्य व्रत अंगीकार :- अल्पायु में लला राजेंद्र ने अपने ग्राम रुर के जिनालय में भगवान् के समीप स्वयं ही ब्रहमचर्य व्रत ले लिया था । ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार करना:- श्री राजेंद्र भैया पूज्य गुरुवर मुनि श्री 108 विराग सागर जी के साथ विहार करते हुए अतिशय क्षेत्र बारासों पधारे। यद्यपि राजेंद्र ने रुर नगर में जिनालय के सामने दीपावली के दिन ब्रह्मचर्य व्रत के लिया था फिर भी गुरुवर के समीप दिनांक 16६ नवम्वर को 17 वर्षकी उम्र में ब्रहमचर्य व्रत पुन: अंगीकार किया। क्षुल्लक दीक्षा:- राजेंद्र भैया ने आचार्य विराग सागरजी से 11 अक्टूबर 1989 को भव्य क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की। उनका नाम रखा गया क्षुल्लक श्री यशोधर सागर जी। इस समय इनकी आयु 18 वर्ष की थी। ऐलक दीक्षा:- परम पूज्य क्षुल्लक श्री यशोधर सागर जी ने आचार्य विराग सागरजी से 2 वर्ष बाद 19 जून 1991 को भव्य ऐलक दीक्षा पन्ना नगर मे ग्रहण की। मुनि दीक्षा:- ऐलक दीक्षा के 6 माह बाद ही 20 वर्ष की आयु में श्रेयांस गिरी में 21 नवंबर 1991 को मुनि दीक्षा ग्रहण की। नाम रखा गया मुनि श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज । आचार्य पदारोहण:-परम पूज्य मुनि श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज को परम पूज्य आचार्य श्री 108 विराग सागर जी के कर कमलो से 31 मार्च 2007 को 35 वर्ष की आयु में आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया।
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