इंदौर। दिगंबर जैन परंपरा में 24 तीर्थंकरों के पंचकल्याणक महोत्सवों का विशेष महत्व है। 20वें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी का गर्भ कल्याणक महोत्सव इस वर्ष 31 जुलाई को श्रावण कृष्ण द्वितीया तिथि पर श्रद्धा-भक्ति से मनाया जाएगा। इस पावन अवसर पर देशभर के दिगंबर जैन मंदिरों, चैत्यालयों, सिद्ध क्षेत्रों और अतिशय क्षेत्रों में विशेष अभिषेक, शांतिधारा, शांतिपाठ, नित्यमह पूजन एवं गर्भ कल्याणक विधान का आयोजन होगा। समस्त श्रावक-श्राविकाएं उपवास, जाप और स्वाध्याय के साथ प्रभु की आराधना में लीन रहेंगे।

गर्भ में अवतरण: दिव्य अलौकिक घटना

जैन शास्त्रों के अनुसार भगवान मुनिसुव्रतनाथ का जीव पूर्व भव में महापुरुष नामक राजा था। उन्होंने मुनि नंदिषेण के समीप दीक्षा लेकर कठोर तप किया और तीर्थंकर नामकर्म का बंध किया। आयु पूर्ण कर वे प्राणत नामक दसवें स्वर्ग में इंद्र हुए। जब छह माह शेष रहे तब हस्तिनापुर नगरी में रत्नों की वर्षा, कल्पवृक्षों का प्रकट होना, दुंदुभि नाद जैसे 15 दिव्य संकेत होने लगे। श्रावण कृष्ण द्वितीया की रात्रि में महारानी पद्मावती ने 16 शुभ स्वप्न देखे। स्वप्न फल बताते हुए महाराज सुमित्र ने कहा कि आपके गर्भ में तीर्थंकर जीव का अवतरण हुआ है। उसी क्षण प्राणत स्वर्ग से च्युत होकर प्रभु का जीव माता पद्मावती के गर्भ में अवतरित हुआ। गर्भ में आते ही इंद्र की आज्ञा से कुबेर ने हस्तिनापुर में साढ़े बारह करोड़ रत्नों की वर्षा की। छप्पन कुमारिकाएं माता की सेवा में नियुक्त हुईं। माता को किसी प्रकार का कष्ट नहीं हुआ। गर्भस्थ शिशु के प्रभाव से महाराज सुमित्र के सभी व्रत-नियम सहज रूप से दृढ़ हो गए, इसलिए गर्भस्थ बालक का नाम ‘मुनिसुव्रत’ रखा गया। नौ माह आठ दिन बाद माघ कृष्ण द्वादशी को प्रभु का जन्म हुआ।

भगवान मुनिसुव्रतनाथ के सिद्धांत और अलौकिक ज्ञान

भगवान मुनिसुव्रतनाथ का समग्र जीवन अहिंसा, संयम और समता का जीवंत आदर्श है। उनका मूल संदेश यही है कि आत्मा स्वयं में परिपूर्ण है, उसे बाहरी पदार्थों से सुख-दुख नहीं मिलता। उन्होंने देशना दी कि व्रत और नियम बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि अंतरंग शुद्धि के साधन हैं। जब तक मन-वचन-काय की प्रवृत्ति कषाय सहित है, तब तक सच्चा सुख संभव नहीं। प्रभु ने स्पष्ट किया कि सच्चा व्रत वह है जो आत्मा को विषयों से हटाकर स्वरूप में स्थापित करे, इसलिए उनका नाम ‘मुनिसुव्रत’ अर्थात् मुनियों के व्रतों को धारण करने वाला सार्थक हुआ। उन्होंने अनेकांतवाद के माध्यम से बताया कि सत्य एकांगी नहीं होता, वस्तु के अनंत धर्म हैं।

क्षमा स्वयं को ही नहीं, सामने वाले को भी शीतल करती है

स्याद्वाद शैली में वस्तु स्वरूप को समझने से आग्रह और हिंसा का जन्म ही नहीं होता। भगवान ने अपरिग्रह को केवल बाह्य त्याग तक सीमित न रखकर भीतर की ममता का त्याग बताया। उनका उपदेश था कि जिसने इच्छाओं का निरोध कर लिया, वही सच्चा सम्राट है, क्योंकि बाहरी साम्राज्य नश्वर है और आत्म-साम्राज्य शाश्वत है। प्रभु ने क्षमा को वीरों का आभूषण कहा। उन्होंने कहा कि क्रोध स्वयं को जलाता है, क्षमा स्वयं को ही नहीं, सामने वाले को भी शीतलकरती है।

बाहरी आलंबन छोड़कर निज शुद्ध चैतन्य में रमण करो

उनकी दिव्यध्वनि में खिरा कि जीव मात्र के प्रति मैत्री, गुणीजनों में प्रमोद, दुखियों पर करुणा और विपरीत बुद्धि वालों के प्रति मध्यस्थ भाव रखना ही सच्चा धर्म है। भगवान मुनिसुव्रतनाथ ने ध्यान की महिमा बताते हुए कहा कि मन की चंचलता ही संसार है और मन का स्थिर होना ही मोक्षमार्ग है। जो साधक राग-द्वेष से रहित होकर ज्ञाता-दृष्टा भाव में रहता है, वह इसी भव में जीवन्मुक्त दशा का अनुभव कर सकता है। उनका अंतिम उपदेश यही था कि आत्मा को परमात्मा बनाने के लिए बाहरी आलंबन छोड़कर निज शुद्ध चैतन्य में रमण करो, क्योंकि मोक्ष न तो स्वर्ग में है न किसी तीर्थ में, वह तो अपनी आत्मा के शुद्ध उपयोग में ही विद्यमान है।

जीवदया और स्वाध्याय का नियम लें तो यही सच्ची प्रभु भक्ति होगी

इस गर्भ कल्याणक पर हम सभी का कर्तव्य है कि प्रभु के इन सिद्धांतों को जीवन में उतारें। अभिषेक-पूजन के साथ-साथ यदि हम क्रोध का त्याग, वाणी का संयम, जीवदया और स्वाध्याय का नियम लें तो यही सच्ची प्रभु भक्ति होगी। भगवान मुनिसुव्रतनाथ का जीवन हमें सिखाता है कि व्रतों की दृढ़ता और समता भाव से ही संसार सागर तिरा जा सकता है।