"पर्व केवल तिथियाँ नहीं होते, वे संस्कृति की स्मृतियाँ और कर्तव्य की चेतना होते हैं। रक्षाबंधन भी ऐसा ही एक महापर्व है। जैन परंपरा में यह केवल भाई-बहन के स्नेह का उत्सव नहीं, बल्कि धर्म, देव, शास्त्र और गुरु की रक्षा के संकल्प का अमर प्रतीक है। आइए, जानते हैं उस ऐतिहासिक प्रसंग को, जिसने रक्षाबंधन को धर्मरक्षा का पर्व बना दिया।"

भगवान अरहनाथ के काल में हस्तिनापुर के चक्रवर्ती महापद्म के दो पुत्र थे—विष्णुकुमार और पद्मराय। जब महापद्म के अंतर्मन में वैराग्य जागा, तब उन्होंने राज्य त्यागकर संयम धारण करने का निश्चय किया। वे राज्य विष्णुकुमार को सौंपना चाहते थे, किंतु विष्णुकुमार ने विनम्रता से कहा, "पिताश्री! जो वस्तु आपको भी असार प्रतीत हो रही है, उसे मैं कैसे स्वीकार करूँ? यदि संसार नश्वर है, तो मुझे भी संयम मार्ग अपनाने की अनुमति दीजिए।"

महापद्म ने प्रसन्न होकर छोटे पुत्र पद्मराय को राज्य सौंप दिया और स्वयं विष्णुकुमार के साथ आचार्य सागरचंद्र के सान्निध्य में दीक्षा ग्रहण कर ली। कठोर तप, ध्यान और आत्मसाधना के प्रभाव से विष्णुकुमार मुनिराज महान ऋद्धिधारी तपस्वी बन गए।

उधर उज्जयिनी में राजा श्रीवर्मा का शासन था। उनके चार मंत्री—बलि, नामुचि, बृहस्पति और प्रह्लाद—अपने ज्ञान और पद का अहंकार रखते थे। उसी समय आचार्य अकंपनाचार्य सात सौ दिगम्बर मुनियों के साथ उज्जयिनी पधारे। अवधिज्ञान से उन्होंने जान लिया कि मंत्री विवाद उत्पन्न कर सकते हैं, इसलिए उन्होंने सम्पूर्ण मुनिसंघ को मौन रहने की आज्ञा दी।

राजा श्रद्धापूर्वक दर्शन करने पहुँचे और धर्मोपदेश का निवेदन किया, पर गुरु-आज्ञा के कारण कोई मुनि नहीं बोले। अवसर पाकर मंत्रियों ने उपहास किया—"देखिए महाराज! जिन्हें लोग ज्ञानी कहते हैं, वे आपके प्रश्नों का उत्तर भी नहीं दे सकते।"

उसी समय श्रुतसागर मुनिराज वहाँ पहुँचे। उन्हें मौन की आज्ञा का ज्ञान नहीं था। एक मंत्री ने उनका उपहास करते हुए कहा, "देखो, कैसा जवान बैल चला आ रहा है।"

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श्रुतसागर मुनिराज ने शांत स्वर में केवल एक शब्द कहा—"स्यात्।" राजा ने उसका अर्थ पूछा। मुनिराज ने अनेकांत और स्याद्वाद का अत्यंत सरल विवेचन किया। शास्त्रार्थ आगे बढ़ा तो पुनर्जन्म का विषय आया। मंत्री ने कहा, "जिसे किसी ने देखा ही नहीं, उसे सत्य कैसे मानें?"

मुनिराज मुस्कराए और बोले, "क्या तुमने अपने माता-पिता का विवाह देखा था?" मंत्री ने उत्तर दिया, "नहीं, पर विश्वसनीय लोगों से सुना है।" तब मुनिराज बोले, "जब बिना देखे भी विश्वसनीय परंपरा पर विश्वास करते हो, तब सर्वज्ञ तीर्थंकरों की वाणी पर विश्वास क्यों नहीं?"

यह सुनते ही चारों मंत्री निरुत्तर हो गए। उनका अहंकार चूर हो गया।

अपमान से क्रोधित होकर वे उसी रात श्रुतसागर मुनिराज की हत्या करने पहुँचे। जैसे ही उन्होंने तलवार उठाई, नगरदेवी ने उनके हाथ वहीं स्तम्भित कर दिए। प्रातःकाल जब लोगों ने यह दृश्य देखा तो राजा श्रीवर्मा ने उन्हें राज्य से निष्कासित कर दिया।

चारों मंत्री हस्तिनापुर पहुँचे और राजा पद्मराय की सेवा में रहने लगे। कुछ समय बाद सिंहध्वज नामक शत्रु राजा पर विजय प्राप्त कराने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रसन्न होकर राजा पद्मराय ने उन्हें वरदान माँगने को कहा। बलि मंत्री ने तत्काल कुछ न माँगकर कहा, "समय आने पर अपना वरदान माँग लूँगा।"

कुछ समय पश्चात आचार्य अकंपनाचार्य पुनः सात सौ मुनियों के साथ हस्तिनापुर पधारे। मंत्रियों के मन का पुराना द्वेष फिर जाग उठा। बलि ने राजा से अपना वरदान माँगा—"महाराज! हमें सात दिन के लिए राज्य का सम्पूर्ण अधिकार प्रदान कीजिए।" वचनबद्ध राजा ने अनुमति दे दी।

राज्य का अधिकार मिलते ही मंत्रियों ने मुनिसंघ पर घोर उपसर्ग आरंभ कर दिया। मुनियों के चारों ओर हड्डियाँ, चमड़ा, मांस और अन्य अपवित्र वस्तुओं के ढेर लगाकर उनमें अग्नि प्रज्वलित कर दी। धुएँ से वातावरण विषाक्त हो गया। सात सौ मुनिराज अचल तप में स्थित रहे, किंतु पूरा नगर व्याकुल हो उठा। श्रावकों ने संकल्प लिया कि जब तक मुनियों का संकट दूर नहीं होगा, वे स्वयं भोजन ग्रहण नहीं करेंगे।

जब यह समाचार विष्णुकुमार मुनिराज तक पहुँचा, तब उन्होंने समझ लिया कि यह केवल मुनिसंघ का नहीं, धर्म की प्रतिष्ठा का प्रश्न है। धर्मरक्षा के लिए उन्होंने अपनी विक्रिया ऋद्धि का प्रयोग किया। वे एक तेजस्वी ब्राह्मण पंडित का रूप धारण कर बलि के समक्ष पहुँचे। उनके वेदपाठ और विद्वत्ता से प्रभावित होकर बलि ने कहा, "विप्रवर! जो चाहें, माँग लीजिए।"

विष्णुकुमार ने उत्तर दिया, "मुझे केवल तीन पग भूमि चाहिए।"

बलि ने सहर्ष स्वीकृति दे दी। उसी क्षण विष्णुकुमार मुनिराज ने अपना विराट रूप धारण कर लिया। एक चरण सुमेरु पर्वत पर और दूसरा मानुषोत्तर पर्वत पर स्थापित हो गया। दो चरणों में सम्पूर्ण मनुष्यलोक नप गया। तीसरे चरण के लिए कहीं स्थान शेष नहीं बचा। तीनों लोकों में विस्मय छा गया।

देवगण उपस्थित हुए और विनयपूर्वक स्तुति करने लगे। बलि तथा उसके साथी मंत्री भयभीत होकर विष्णुकुमार मुनिराज के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने अपने अपराध स्वीकार किए और क्षमा माँगी। विष्णुकुमार मुनिराज ने उन्हें क्षमा करते हुए मुनिसंघ पर हो रहा उपसर्ग तत्काल समाप्त कराया। धर्म की विजय प्रतिशोध से नहीं, क्षमा से हुई।

श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन सात सौ मुनियों ने पारणा किया। श्रावकों ने श्रद्धापूर्वक दूध की सेवड़ियों तथा शुद्ध आहार से उनका पारणा कराया। जिन घरों में मुनि नहीं पहुँच सके, वहाँ लोगों ने मुनियों की प्रतीक प्रतिमा स्थापित कर श्रद्धाभाव से आहार अर्पित किया। उस दिन समाज ने एक-दूसरे के हाथों में रक्षा-सूत्र बाँधकर यह संकल्प लिया—

"जब भी धर्म, देव, शास्त्र और गुरु पर संकट आएगा, हम तन, मन और धन से उनकी रक्षा करेंगे।"

यही धर्मरक्षा का संकल्प आगे चलकर रक्षाबंधन पर्व के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। लोकमान्यता है कि दीवारों पर बनाई जाने वाली "सोन" चित्र-परंपरा का संबंध भी प्राचीन "श्रमण" परंपरा की स्मृति से जोड़ा जाता है।

आज रक्षाबंधन केवल कलाई पर धागा बाँधने का पर्व नहीं है। यह हमें याद दिलाता है कि धर्म की रक्षा शस्त्र से नहीं, शास्त्र से; हिंसा से नहीं, अहिंसा से; और क्रोध से नहीं, करुणा से होती है। जब हमारे जीवन में मैत्री, दया, अनुकम्पा और वात्सल्य का भाव जागृत होगा, तभी रक्षाबंधन का वास्तविक संदेश सार्थक होगा।

बोल अनमोल

राखी की डोरी केवल हाथों को नहीं बाँधती, वह मनुष्य को उसके धर्म, संस्कार और कर्तव्य से भी जोड़ती है। जो धर्म की रक्षा का संकल्प निभाता है, वास्तव में वही अपने जीवन को सार्थक और समाज को सुरक्षित बनाता है।