Muni_Shri_Vinatsagar_Ji_delivered_an_auspicious_sermon_on_the_occasion_of_the_Dashlakshan_Mahaparva.
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सारांशः-
वाशिम। ऐतिहासिक एवं धार्मिक नगरी वाशिम में दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर प्रथम दिवस ‘उत्तम क्षमा धर्म’ के उपलक्ष्य में विशेष धार्मिक प्रवचन का आयोजन किया गया। आचार्य विनम्रसागरजी के परम प्रभावक मुनिश्री विनतसागरजी ने अपने प्रवचन के माध्यम से उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को ज्ञान एवं अध्यात्म का अमृत प्रदान किया।
मुनिश्री ने अपने प्रवचन में कहा कि क्रोध आत्मा की शांति को भंग करता है, जबकि क्षमा मनुष्य को आत्मिक शांति और सद्भाव की ओर ले जाती है। जीवन में आने वाली परिस्थितियों में क्रोध के स्थान पर क्षमाभाव अपनाना चाहिए। परिवार, समाज एवं आपसी संबंधों में क्षमा का भाव रखने से मन में शांति तथा सकारात्मकता का निर्माण होता है। प्रवचन के दौरान पांच ज्ञानवर्धक प्रश्न उपस्थित भक्तों के समक्ष रखे गए। सही उत्तर देने वाले भक्तों को कमेटी अध्यक्ष श्रेणिक भूरे जैन की ओर से विशेष पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया गया। इस ज्ञानमंजुषा के माध्यम से श्रद्धालुओं में धर्म के प्रति जिज्ञासा और चिंतन को बढ़ावा मिला। इस अवसर पर मंच पर श्रमण मुनिश्री विश्वद्रुगसागरजी भी विराजमान थे। दोनों मुनिराजों के पावन सान्निध्य से वाशिम में दशलक्षण महापर्व एवं पर्युषण महापर्व का धार्मिक वातावरण और अधिक भक्तिमय बना हुआ है। दशलक्षण महापर्व आत्मचिंतन, संयम, सद्गुणों की साधना तथा आत्मशुद्धि का पावन पर्व है। उत्तम क्षमा का संदेश प्रत्येक व्यक्ति को क्रोध छोड़कर क्षमा, प्रेम और संयम को जीवन में अपनाने की प्रेरणा देता है। प्रवचन से उपस्थित श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ प्राप्त किया।



