दिल्ली। ऋषभोदय, ऋषभविहार में विराजित दिगंबर जैन पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए जीवन में वास्तविक स्वतंत्रता के स्वरूप पर प्रकाश डाला। पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के परम भक्त वैभव जैन बड़ामलहरा ने यह जानकारी दी।
सत्य का बोध ही सच्ची स्वतंत्रता
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि जीवन में यथार्थ-सत्य का बोध होना ही सच्ची स्वतंत्रता है। जब तक मनुष्य को अपनी परतंत्रता का बोध नहीं होगा, तब तक वह स्वतंत्र होने का पुरुषार्थ नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने भीतर यह भाव जागृत करना चाहिए कि ‘मैं स्वतंत्र था, स्वतंत्र हूं और स्वतंत्र ही रहूंगा।’ स्वतंत्रता का बोध होते ही आत्मशोध की शुरुआत होती है।
राग की रस्सी से बंधा मनुष्य
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति राग की रस्सी से बंधा हुआ है, उसे अभी अपनी वास्तविक स्वतंत्रता का बोध नहीं है। जिस प्रकार रस्सी से बंधा पशु भी बंधन से मुक्त होना चाहता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने भीतर के राग-द्वेष और परतंत्रता के बंधनों को पहचानकर उनसे मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए।
दर्लभ है तत्वज्ञान
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि वर्तमान समय में सत्य कहने वाले दुर्लभ हैं, सत्य सुनने वाले उससे भी कम और सत्य को स्वीकार कर उसके अनुसार आचरण करने वाले अत्यंत अल्प हैं। मनुष्य भव, उच्च कुल, उत्कृष्ट क्षयोपशम, स्वस्थ तन-मन, अच्छे गुरु, श्रेष्ठ देश और अच्छे मित्र एवं सहयोगी मिलना भी अत्यंत दुर्लभ है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपनी शक्ति का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। शक्ति को समीचीन कार्यों में लगाकर विनाश के स्थान पर सृजन करना चाहिए। वृक्षों को उखाड़ने के बजाय नए वृक्ष लगाने चाहिए, क्योंकि बीज से अंकुर, अंकुर से वृक्ष और वृक्ष से छाया एवं फल प्राप्त होते हैं।
त्याग से मुक्ति का संदेश
त्याग के महत्व को समझाते हुए पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने तोते का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि गुरु के वचन सुनकर तोते ने दाना-पानी का त्याग कर दिया। जब वह कमजोर होकर निढाल पड़ा रहा तो मालिक ने दया करते हुए पिंजरे का द्वार खोल दिया। द्वार खुलते ही तोता आकाश में उड़ गया। इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने बताया कि वास्तविक त्याग व्यक्ति को बंधन से मुक्ति की ओर ले जाता है।
किसी को परतंत्र न बनाएं
उन्होंने कहा कि सच्ची स्वतंत्रता केवल स्वयं स्वतंत्र होने में नहीं, बल्कि दूसरों को भी परतंत्र न बनाने में है। उन्होंने सभी को संकल्प लेने का संदेश दिया कि किसी जीव को जाल में न फंसाएं और किसी को पिंजरे में बंद न करें। परिवार और समाज में भी एक-दूसरे को अनावश्यक बंधन एवं पीड़ा नहीं देनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि सास बहू को न सताए, बहू सास को न सताए, मालिक सेवक को न सताए, धनिक निर्धन को न सताए और बलवान कमजोर को न सताए। किसी को परतंत्र न करना ही सच्ची स्वतंत्रता की भावना है।
संस्कारवान संतान देश-धर्म की आधारशिला
देश और धर्म की रक्षा के संदर्भ में पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि संस्कारवान संतान समाज और राष्ट्र के भविष्य की आधारशिला है। सनातन संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए संतान को जन्म देने के साथ उन्हें अच्छे संस्कार देना भी आवश्यक है। आने वाली पीढ़ी ही देश, धर्म और संस्कृति की जिम्मेदारी आगे बढ़ाएगी।
स्वतंत्रता का बोध ही आत्मजागरण
धर्मसभा में दिए संदेश का मूल भाव यही रहा कि स्वतंत्रता केवल बाहरी बंधनों से मुक्ति नहीं, बल्कि भीतर के राग, मोह और परतंत्रता से मुक्त होने का मार्ग है। आत्मबोध, त्याग, संयम, करुणा और दूसरों को स्वतंत्र रखने की भावना से ही स्वतंत्रता सार्थक बनती है।



