आगरा। पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर, शालीमार एन्क्लेव, कमला नगर से महावीर दिगंबर जैन मंदिर, डी ब्लॉक, कमला नगर में मंगल प्रवेश हुआ। पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज के तीन परम प्रभावक शिष्य मुनि समत्व सागर महाराज, मुनि शील सागर महाराज एवं मुनि सुप्रभात सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में महावीर दिगंबर जैन मंदिर में भव्य प्रवेश हुआ। धर्मसभा का शुभारंभ पदाधिकारियों द्वारा आचार्य विराग सागर महाराज के चित्र अनावरण और पाद प्रक्षालन के साथ किया गया। रविवार को युवाओं को समर्पित विशेष वंडरफुल जैनिज्म सेशन-11 का आयोजन आचार्य विद्यासागर संत सदन में किया गया। मुनि श्री के सानिध्य में आयोजित इस मोटिवेशनल सत्र में युवाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
जैनों का गौरव स्वयं जैनियों के हाथों में है
मुनि समत्व सागर महाराज ने अपनी अमृतमय वाणी में कहा -जैन इज द स्ट्रांगेस्ट ब्रांड और हम सभी जैन धर्म के ब्रांड एम्बेसडर हैं। इसलिए हमारा प्रत्येक व्यवहार, आचरण और जीवनशैली जैन धर्म की पहचान बनता है।
यू आर बीइंग वाच्ड! समाज ही नहीं, पूरी दुनिया हमारे आचरण को देखती है। इसलिए हमें ऐसा जीवन जीना चाहिए जिससे जैन धर्म का गौरव बढ़े। जैनों का गौरव स्वयं जैनियों के अपने हाथों में है। भारत में जैन समाज एक ऐसा विशिष्ट समाज है, जिसके नाम से भोजन की पहचान होती है - जैन भोजन। यह हमारी अहिंसा, करुणा और विशिष्ट जीवनशैली का परिचायक है।
संस्कारों को फिर से जीवंत करने की आवश्यकता
जब कोई महंगा मोबाइल, माइक या अन्य आधुनिक उपकरण काम करना बंद कर देता है तो वह केवल एक डिब्बा बनकर रह जाता है। ठीक इसी प्रकार यदि हम जैन धर्म के सिद्धांतों और संस्कारों का पालन नहीं करते, तो हमारा जैन कहलाना भी केवल नाम मात्र रह जाता है।
यंगस्टर्स आर द रे ऑफ होप। यदि युवा पीढ़ी धर्म और संस्कारों से नहीं जुड़ेगी, तो जैन धर्म का भविष्य कैसे सुरक्षित रहेगा? युवाओं की सक्रिय भागीदारी के बिना धर्म और समाज की निरंतरता की कल्पना नहीं की जा सकती। आज घर तो बड़े-बड़े बन गए हैं, लेकिन विडंबना है कि लोग एक-दूसरे के घर तक जाना पसंद नहीं करते। परिवारों और समाज के बीच आपसी मेलजोल, आत्मीयता और संस्कारों को फिर से जीवंत करने की आवश्यकता है।
अपनी जैन भोजन परंपरा की विशेषता समझिए
शाकाहारी और मांसाहारी रेस्तरां, मैकडॉनल्ड्स और पिज्जा हट जैसे आकर्षणों के पीछे भागने की बजाय अपनी जैन भोजन परंपरा की विशेषता समझिए। बिना प्याज-लहसुन के भी जैन भोजन इतना स्वादिष्ट और उत्कृष्ट हो सकता है कि उसकी अपनी अलग पहचान है।
पैसा कई बार व्यक्ति को धर्म और संस्कारों से दूर ले जाता है। इसलिए धन कमाने के साथ-साथ यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि कहीं धन हमारे धर्म और जीवन मूल्यों को हमसे दूर तो नहीं कर रहा। जैन होना केवल जन्म से मिली पहचान नहीं, बल्कि जीवन में जैन सिद्धांतों को अपनाने की जिम्मेदारी है। युवा पीढ़ी अपने आचरण, खान-पान, संस्कार और सामाजिक व्यवहार से जैन धर्म की सबसे प्रभावशाली पहचान बन सकती है।
सकल जैन समाज उपस्थित रहा
मुनि श्री ने युवाओं को आत्मचिंतन के साथ अपने जैन गौरव को समझने, अपनाने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की प्रेरणा दी। मंच संचालन मनोज बाकलीवाल ने किया। इस मौके पर मंदिर कमेटी के प्रदीप जैन पीएनसी, जगदीश प्रसाद जैन, मनोज जैन बाकलीवाल, यशपाल जैन, सुभाष जैन बंटी, अनुज क्रांति जैन, अनिल जैन रहिस, नरेश लुहाडिया, अनिल जैन एफसीआई, मीडिया प्रभारी राहुल जैन सहित समस्त सकल जैन समाज मौजूद रहा।




