आगरा। आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी के तीन परम प्रभावक सुयोग्य शिष्य श्रमण मुनि श्री 108 समत्व सागर महाराज, श्रमण मुनि श्री 108 शील सागर महाराज एवं श्रमण मुनि श्री 108 सुप्रभात सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। धर्मसभा का शुभारंभ पदाधिकारियों द्वारा आचार्य विराग सागर जी महाराज के चित्र अनावरण और समाज द्वारा मुनि श्री के पाद प्रक्षालन के साथ किया गया। मंदिर आगमन के बाद महाराज श्री के मुखारविंद से शांतिधारा की गई, उसके बाद प्रवचन और फिर आहारचर्या संपन्न हुई।

मुनि श्री समत्व सागर जी ने यमुना के प्रदूषण को गंभीर बताया

मुनि श्री ने अपनी अमृतमय वाणी में कहा कि आप जब विहार करके आ रहे थे तो एक नदी पड़ी थी। समझ गए, यमुना थी कि कालिंदी? क्या थी? यमुना ही है वो। यमुना ही है, मुझे तो लगा नाला था लेकिन, जैसे ही उसके पास से कोई निकला, सबने अपने मुख पर, नाक पर तो हाथ रख ही लिया था। जैसे ही उसके पास आए, भले ही अब उस पर चलने लगे तो थोड़ी देर हो गई थी तो उसमें अनुकूलता लगने लगी थी कि नाक पर हाथ जम गया था। जब जैसे ही सुंदर वातावरण से और वो बदबूदार स्थान पर पहुंच गए तो नाक पर हाथ चला गया और कई लोग वहां पर बिल्कुल बिना नाक पर हाथ रखे जा रहे थे। देखना, कई लोग ऐसे हैं। कई लोग ऐसे हैं जिनके पास जाते ही कान और नाक पर हाथ रखने का मन हो जाता है। क्यों? बदबूदार लोग। इसमें आपका नाम तो नहीं आता ना? आपका नाम तो नहीं आता ना कि इसके पास आओ तो मात्र यह किसी की निंदा करेगा, किसी की आलोचना करेगा अथवा इधर-उधर की बातें करेगा, मुख खुलेगा तो बदबू और मेरे कान में भर देगा, है ना? कुछ लोग नाक पर उंगली रखते हैं, नाक को बंद करते हैं, क्यों? बदबू आती है। मुझे तो लगता है जो मन की कलुषता है, वह तो अंतरंग तक को कलुषित कर देती है। मात्र नाक में ही बदबू नहीं फैलाती।

भेड़ चाल चलने से बचना चाहिए

पहले एक बार मिल लेते हैं, आप सब तो अच्छे लोग हैं ना? आप लोगों के मुख से तो ऐसी प्रवृत्ति नहीं होती ना? आप तो बहुत सुंदर स्थानों पर रहते हैं ना? है कि नहीं? हाँ, मुझे आवाज आई, सबकी होती है। किसी ने तो बोला सबकी होती है। ये सबकी प्रवृत्ति के चक्कर में हम अपनी प्रवृत्ति क्यों बिगाड़ लेते हैं? इससे बड़ी राहत मिलती है, इससे बड़ी राहत मिलती है यदि सब कर रहे हैं ना, तो हम भी कर सकते हैं। जबकि सब यदि आप बोलते तो हैं, भेड़चाल नहीं चलनी चाहिए, है ना? सब अगर एक भेड़ गिरे तो सारी भेड़ उसके पीछे-पीछे चलती हैं। आप सब भेड़ भी नहीं दिखाई दे रहे हैं मुझे। फिर भी सबकी होती है। ये जो अंतरंग की आवाज है ना कि सभी तो ऐसा करते हैं, इसमें कौन सी विशेषता है? इसलिए तो सभी... जिस संसार में सारे संसारी हैं, उसी संसार में बैठे हुए हैं। जो इस प्रवृत्ति को छोड़ देते हैं, उनके मुख से सुगंध ही सुगंध बरसती है।

वचन ऐसे होते हैं कि भाव तुरंत बिगड़ जाएं

वो आंखों से भी ग्रहण होता है, कुछ नाक से ग्रहण होता है और कुछ कानों से ग्रहण होता है। वो तीनों का जहां सुगंध ही सुगंध होती है, वह देख लो वीतरागी मुद्रा। वचन ऐसे हों कि भावनाएं सुधर जाएं। वचन ऐसे हों कि भावनाओं में अंतर आ जाए, किंतु वचन ऐसे होते हैं कि भाव तुरंत बिगड़ जाएं। मैं अपने वचनों से सारे जगत के भाव को बिगाड़ने का काम कर देता हूं, लेकिन मेरे भाव क्यों बिगड़ते हैं? इस बात पर आपको विचार करना है।

यहां की सुगंध अपने अंतरंग को आनंदित कर दिया करती है

आज ये पंक्तियां कुछ यही कह रही हैं कि मुझे कौन से भाव करने चाहिए थे जो मैं आज तक नहीं किया और इनके पास जब भी अरिहंत के पास आते हैं, अथवा अरिहंत भगवान के समवशरण में जो जीव पहुंच जाता है, क्या परिणाम होंगे उनके? कि उनके प्रांगण, क्या उनकी सीमा में आते ही जन्मजात बैरी बैर छोड़ देता है? बिना कुछ कहे, दूर से नाला दिखा तो नाक बंद हुई और दूसरी ओर दूर से सुगंध मिलेगी तो अपने आप आनंद आएगा कि नहीं आएगा? यानी यूं ऐसे ही कुछ होता है। हमारे कितने ही बैर हों, कितने ही कलुषित परिणाम हों, जब इस प्रांगण में आते हैं ना तो अपने आप यहां की सुगंध अपने अंतरंग को आनंदित कर दिया करती है, किंतु जैसे ही बाहर जाते हैं, बड़ा अंतर तो यह है।

पुराण ग्रंथों को समझा, वे कोई काल्पनिक घटनाएं हैं

अभी-अभी मैं सब देखता रहता हूं प्रवचन। लोग सोचते हैं, अभी मनोज भैया कह रहे थे कि महाराज जी, ये युवा तो आते नहीं हैं, प्रवचन में तो आना ही नहीं चाहते। यानी प्रवचन कोई बाहर की वस्तु नहीं है, कपोल कल्पित घटनाएं नहीं हैं। और जितने लोग प्रवचन सुनने आते हैं ना, मुझसे अधिकांश लोग बोल जाते हैं, आज का प्रवचन तो महाराज जी जैसे हमारे ऊपर ही दे रहे थे आप। क्योंकि हमने अभी तक प्रवचन को अथवा पुराण ग्रंथों को यह समझा कि वे कोई काल्पनिक घटनाएं हैं, वे हमारे जीवन से संबंधित नहीं हैं, इसलिए हम उनसे संबंध नहीं बना पाए और जिस दिन आपको समझ में आ जाए कि ये किसी दूसरे की बातें नहीं चल रही हैं, ये हमारे ही मध्य की, हमारे ही जीवन के, हमारे ही संसार के परिणामों की दशाओं को व्याख्यायित कर रही हैं, तो बड़ा आनंद आता है।

विरोधी की भी प्रशंसा करना सीखो

जब कोई आपकी प्रशंसा करता है, आनंद आता है ना? अच्छा बताओ, एक आपका मित्र हो और वो भले ही वो कैसा ही हो, लेकिन वो बात-बात पर आपकी तारीफ करता मिले, आनंद आएगा कि नहीं? मैं कला सिखा रहा हूं, जिसको अपने विरोधी को भी अपने अधीन करना हो ना, तो उसकी प्रशंसा करना सीख लो। वो चाह कर भी तुम्हारा विरोध नहीं कर पाएगा। इस मौके पर समस्त सकल जैन समाज मौजूद रहा।