सागवाड़ा। पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा से अंतरराष्ट्रीय वेबीनार को संबोधित करते हुए वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनकनंदी जी गुरुदेव ने कहा कि विश्व में मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। मानव अपने विवेक, पुरुषार्थ, ज्ञान और विज्ञान के माध्यम से स्वयं को सुसंस्कृत बनाकर उन्नति के सर्वोच्च शिखर तक पहुंच सकता है। केवल बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं और भौतिक सुख-सुविधाओं की उपलब्धता से कोई समाज, धर्म या राष्ट्र महान नहीं बन सकता। महान समाज और राष्ट्र के निर्माण के लिए महान व्यक्तित्व वाले मनुष्यों का निर्माण आवश्यक है।
आचार्यश्री ने कहा कि महान व्यक्तियों की समष्टि से महान समाज और महान समाज के समूह से महान राष्ट्र का निर्माण होता है। इसी प्रकार महान राष्ट्रों के समूह से अखिल मानव समाज और विश्व का संगठन बनता है। इसलिए व्यक्ति निर्माण ही समाज, राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व निर्माण का मूल आधार है।
उन्होंने कहा कि आज देश, राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकास और निर्माण की बातें तो बहुत हो रही हैं, लेकिन मानव निर्माण को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं दी जा रही है। यदि देश और समाज को योग्य, प्रगतिशील एवं सुसंस्कृत बनाना है तो व्यक्ति निर्माण के कार्य को प्रथम और प्रधान स्थान देना होगा।
आचार्यश्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार दीपक स्वयं प्रकाशित होकर दूसरों को प्रकाश देता है, उसी प्रकार मनुष्य स्वयं सुसंस्कृत और आदर्शवान बनकर दूसरों को भी संस्कारवान बना सकता है। जैसे बीज में भविष्य का वृक्ष छिपा होता है, वैसे ही आज का बालक भविष्य का नागरिक और राष्ट्रनायक है। आज का बालक ही कल का पालक है।
बाल संस्कार ही राष्ट्र निर्माण की नींव
आचार्यश्री ने कहा कि बालक समाज की महत्वपूर्ण इकाई, भविष्य की धरोहर और राष्ट्र का कर्णधार है। इसलिए बच्चों को सभ्य, विनयशील, सुसंस्कृत, ज्ञानी, धैर्यवान, वीर, देशभक्त, कर्तव्यनिष्ठ, अनुशासनप्रिय, समयानुशासित, देव-शास्त्र-गुरु भक्त, माता-पिता के आज्ञाकारी, त्यागी एवं धर्मपरायण बनाना माता-पिता, अभिभावकों, गुरुजनों और राष्ट्र का सर्वोपरि नैतिक दायित्व है।
उन्होंने कहा कि बालकों का संस्कार निर्माण वास्तव में व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र, धर्म, सभ्यता और संस्कृति को उन्नत बनाने का कार्य है। इसलिए बाल्यावस्था से ही बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
आचार्यश्री का बाल संस्कारों पर विशेष जोर
आचार्यश्री कनकनंदी जी गुरुदेव स्वयं विद्यार्थी जीवन से ही बालकों और विद्यार्थियों के प्रति विशेष संवेदनशील रहे हैं। विद्यार्थी अवस्था में उन्होंने स्वयं अध्ययन करने के साथ अन्य विद्यार्थियों को निःशुल्क ट्यूशन भी पढ़ाया। साधु जीवन में भी वे बच्चों को शिक्षा एवं संस्कार प्रदान करते हैं तथा उनके लिए शिविर आयोजित कर उन्हें प्रोत्साहित करते हैं।
बच्चों में आत्मविश्वास और उत्साह बढ़ाने के लिए उन्हें धार्मिक गतिविधियों में सहभागी बनाया जाता है। आचार्यश्री उनसे पड़गाहन एवं पूजन जैसी धार्मिक क्रियाएं करवाते हैं तथा उनके प्रश्नों और उत्तरों को भी ध्यानपूर्वक सुनते हैं। बच्चों को प्रोत्साहन देने के लिए पुरस्कार आदि प्रदान कर उनके व्यक्तित्व विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
आचार्यश्री ने संदेश दिया कि यदि आज के बालक को ज्ञान, संस्कार, अनुशासन, धर्म और कर्तव्यबोध से जोड़ा जाएगा, तो वही बालक भविष्य में संस्कारित समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण करेगा।



