सीकर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ के साधुओं और पंडित धर्मचंद गुरुजी के सान्निध्य में दोपहर में प्रवचन सार की गाथा में वैयाव्रत सेवा प्रकरण की विवेचना चल रही है। जिसमें बताया गया कि साधु भी अन्य बड़े साधु आचार्य की सेवा करने में 6 काय के जीवों की रक्षा का भाव रखते हैं। साधु व्यवहार चारित्र मूलगुण का ध्यान रखते हैं। आचार्य श्री मध्य में अनेक साधुओं की जिज्ञासा का समाधान की करते हैं।आरंभ करना साधु का नहीं श्रावक का कार्य होता है। श्रावक को भी विवेक पूर्वक सेवा कार्य करना चाहिए।

1003680693.jpg

5 चौके आहार के लिए आ जाते थे

डॉ.राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि आचार्य भद्रबाहू के समय चामुंडराय शिष्य भी मुनि बने तब साधुओं की तप संयम के प्रभाव से देवता नगर बसा कर आहार देते थे। मुनि चामुंडराय आहार के बाद कमंडल भूल गए। जब वापस कमण्डल लेने गए तब पता लगा कि कोई नगर था नहीं कमण्डल वृक्ष पर टंगा था। उसे भी चारित्र पालन में दोष मान कर पायश्चित लिया। प्रकरण में दीक्षा गुरु आचार्य श्री धर्म सागर जी का इतना पुण्य प्रबल था कि जब विहार होता तो बिना सूचना के किशनगढ़ से 5 चौके आहार के लिए आ जाते थे, उस समय गुरु के प्रति भक्ति के भाव तार हृदय से जुड़े रहते।

धर्म के गुण रहस्य बताया

धर्म सभा में श्रावक श्राविकाओं को साधु के ऊपर कुर्सी पर बैठना विनय गुण नहीं है।इसके पूर्व प्रात काल आर्यिका श्री निर्मोहमति माताजी ने अपने उपदेश में यह बताया कि श्रावक किस प्रकार अपने पुण्य में वृद्धि कर सकता है उसे किस प्रकार भगवान के दर्शन, धार्मिक कार्य करना चाहिए। श्रावक मंदिर जब नंगे पैर, बिना चप्पल के जाएगा तो अपने पैरों की रक्षा करने के साथ जीवों की रक्षा भी करेगा। इससे उसके पुण्य में वृद्धि होती है। मराठी, कन्नड़ भाषी आर्यिका श्री विनम्रवती जी ने अपने उपदेश में अनेक कथाओं के माध्यम से धर्म के गुण रहस्य बताया।

जीवन का सार आत्मा की भलाई

पूज्य माताजी ने सीकर के पुण्य की प्रशंसा में बताया कि सीकर में दादा गुरु श्री धर्म सागर जी की समाधि हुई है तथा पूर्व आचार्य श्री अजीत सागर जी और अन्य साधुओं की दीक्षा स्थली भी है। अब 7 दीक्षा होने वाली है।आचार्य संघ के रूप में धर्मतीर्थ सीकर में पुण्य का समुद्र आया है। भगवान के दर्शन से अनेक उपवास का फल मिलता है देव शास्त्र गुरु की भक्ति करने से पुण्य की प्राप्ति होती है शक्ति अनुसार सभी को आहार दान करना चाहिए जिस प्रकार दूध का सार मलाई है उसी प्रकार जीवन का सार आत्मा की भलाई है।

भगवान दिखते नहीं फिर क्यों जाते हो?

एक सूरदास भगवान के दर्शन करने रोजाना बच्चों को लेकर जाता था। जब उससे किसी ने प्रश्न किया कि तुम को तो भगवान दिखते नहीं फिर क्यों जाते हो? तब उन्होंने कहा कि मुझे भगवान नहीं दिखते किंतु मुझे तो भगवान देख रहे हैं। गुरु और भगवान के प्रति ऐसी प्रकार दृढ़ भक्ति श्रद्धा से ही पुण्य की प्राप्ति होती है। समाज में धर्म संस्कारों की वृद्धि के लिए शिक्षण शिविर में सैकड़ो हर उम्र के भक्तों द्वारा भाग लिया जा रहा है। जिसमें संघ के मुनिराज, माताजी साधु धर्म का लाभ दे रहे हैं। संघ की आहार व्यवस्था के लिए अनेक नगरों किशनगढ़, पारसोला, उदयपुर, इंदौर, सनावद निवाई, टोंक आदि नगरों से भक्त नियमित आ रहे हैं।