भोपाल(डॉ. संगीता मनोज जैन)। तुलसी मानस प्रतिष्ठान, मध्यप्रदेश द्वारा आयोजित तुलसी जयंती समारोह-2026 के अवसर पर श्री राम किंकर उपाध्याय पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र को श्रमण संस्कृति के 50 से अधिक आधारभूत शास्त्रीय ग्रंथ भेंट किए गए। इन ग्रंथों में षट्खण्डागम, कसायपाहुड़, आदिपुराण, उत्तरपुराण, हरिवंशपुराण सहित प्राकृत, संस्कृत तथा अपभ्रंश भाषा में विरचित अनेक ग्रंथ शामिल हैं। सभी अमूल्य ग्रंथ सिंघई सतीशचन्द्र-केशरदेवी जैन जनकल्याण संस्थान, नैनागिरि की ओर से वरिष्ठ प्रशासक सुरेश जैन (आईएएस) एवं न्यायमूर्ति विमला जैन द्वारा प्रदान किए गए। इस समारोह में मंच पर दीदी मंदाकिनी राम किंकर, पूर्व राज्यपाल कप्तानसिंह सोलंकी, पूर्व सांसद तथा प्रतिष्ठान के कार्याध्यक्ष रघुनंदन शर्मा, पूर्व सांसद तथा तुलसी मानस के संपादक पीडी मिश्रा विराजमान थे।
भारतीय ज्ञान परंपरा का आद्य ग्रन्थ
डॉ. संगीता मनोज जैन ने बताया कि लगभग दो हजार वर्ष पुरानी भारतीय आध्यात्मिक और दार्शनिक परंपरा का षट्खण्डागम आधारभूत ग्रंथ है। षट्खण्डागम जीवन का विज्ञान है। अतीत के बोध का दर्पण है। भारतीय ज्ञान परंपरा का आद्य ग्रन्थ है। यह जीवन और जीविका के बीच प्रभावी संतुलन स्थापित करता है। यह हमारे दुगुर्णाे को दूर कर हमें शक्ति संपन्न करता है। हमें नैतिक रूप से सशक्त करता है। अंतः षट्खण्डागम के सार को केवल मंदिर तक सीमित न रखकर अपने दैनिक व्यवहार में सम्मिलित और सम्मिश्रित करना तथा उसके मूल संदेश को अपने जीवन में उतार कर अपना भौतिक, आध्यात्मिक, मानसिक और भावनात्मक विकास करना आवश्यक है।
सौभाग्यजनक स्रोतस्विनी बनकर अमर हो गई
यह परिस्थितियों का सुखद संयोग है कि आचार्य वीरसेन ने धवला टीका 8 अक्टूबर 816 को पूरी की और महाकवियत्री माता जी ने 1190 वर्षाे के बाद 4 अप्रैल, 2007 को अपने दीक्षा दिवस पर सिद्धांत चिंतामणि टीका पूरी की। उनकी जन्म जयंती और संयम जयंती की शरदपूर्णिमा भारतीय संस्कृति की सौभाग्यजनक स्रोतस्विनी बनकर अमर हो गई है।
उनके अवदान से पूरा साहित्यिक जगत उपकृत
डॉ. संगीता मनोज जैन ने बताया कि गणिनी ज्ञानमती माता जी की संस्कृत में सिद्धांत चिंतामणि और आर्यिका चन्दनामती जी की आधुनिक हिन्दी में ज्ञान चिंतामणि टीकाओं ने षट्खण्डागम के रहस्य को प्रामाणिक रूप से विश्व के समक्ष उद्घाटित कर दिया है। दोनो विदुषी माताओं ने षट्खण्डागम के प्रत्येक सूत्र की विशद व्याख्या करते हुए उसमें गर्भित असीम अर्थ का अनावरण कर दिया है । परिणामतरू षट्खण्डागम का आधुनिक विज्ञान से तकनीकी संवाद सहज और सरल हो गया है। भौतिकी और चेतना की अवधारणाओं के बीच तुलना करना आसान हो गया है। भौतिकशास्त्र के साथ चेतना का सम्मिलन और समन्वय संभव हो गया है। उनके अवदान से पूरा साहित्यिक जगत उपकृत है। संस्कृत साहित्य के विकास में ज्ञानमती जी का और हिन्दी तथा अंग्रेजी साहित्य के विकास में चन्दनामती जी के अनुपम योगदान की सर्वत्र सराहना की जा रही है।
नई पीढ़ी भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ सके
महावीर काल के गत 2500 वर्षाे के इतिहास में किसी साध्वी युगल द्वारा सर्वप्रथम अभिलिखित संस्कृत में सिद्धांत चिंतामणि तथा हिन्दी में ज्ञान चिंतामणि का आज हम जयगान करते है। ब्राम्ही और सुंदरी की भांति वर्तमान जैन जगत की इन दोनों सुविज्ञ सुपुत्रियों और संयतिकाओं को हम शत-शत प्रणाम करते है। गणिनी ज्ञानमती जी की प्रेरणा से इस वर्ष षट्खण्डागम का द्विसहस्राब्दी समारोह राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जा रहा है और इस ग्रंथ पर आधुनिक संदर्भों में व्यापक शोध, अध्ययन और व्याख्या की जा रही है ताकि नई पीढ़ी भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ सके।



