अंबाह। शनिवार का दिन अंबाह के जैन समाज के लिए केवल एक धार्मिक आयोजन का दिन नहीं था बल्कि श्रद्धा, संकल्प और विश्वास की परीक्षा का दिन बन गया था। जैन बगीची में 35 दिवसीय णमोकार महामंत्र महाविधान की पूर्णाहूति के बाद भव्य रथयात्रा निकलनी थी। मौसम विभाग ने भारी बारिश की चेतावनी जारी की थी। प्रशासन ने एहतियात के तौर पर स्कूल बंद रखने के आदेश दिए थे। आसमान में बादल थे लेकिन, दोपहर 3 बजे तक बारिश नहीं हुई। मानो प्रकृति भी इस पावन आयोजन के लिए कुछ समय ठहर गई हो। फिर जैसे ही रथयात्रा प्रारंभ होने का समय आया, अचानक बारिश शुरू हो गई।

एक कदम श्रद्धा का था, दूसरा विश्वास का...

कुछ श्रद्धालुओं ने मौसम को देखते हुए सुझाव दिया कि रथयात्रा अगले दिन निकाली जाए। परिस्थितियां भी यही संकेत दे रही थीं कि शायद आज यात्रा निकालना कठिन होगा लेकिन, तभी गणिनी आर्यिका श्री संगममति माताजी ससंघ का दृढ़ संकल्प सामने आया। रथयात्रा आज ही निकलेगी। बस, यही शब्द श्रद्धालुओं के लिए निर्णय बन गए। शुरुआत में रथयात्रा में दस लोग भी नहीं थे। बारिश सामने थी, रास्ता कठिन था और मन में स्वाभाविक संकोच भी था। लेकिन कुछ श्रद्धालु आगे बढ़े। फिर धीरे-धीरे कदम जुड़ते गए। एक कदम श्रद्धा का था, दूसरा विश्वास का... और फिर देखते ही देखते पूरा कारवां बनता चला गया। रथयात्रा आगे बढ़ी। करीब 20 मिनट बाद जब यात्रा जायसवाल रोड तक पहुंची, तो अचानक बारिश थम गई।

णमोकार महामंत्र की गूंज, श्रीजी के जयकारे

जिस आकाश से कुछ देर पहले पानी बरस रहा था, वही आकाश अब शांत था। रथ आगे बढ़ रहा था और उसके साथ श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ती जा रही थी। यह दृश्य अंबाह के लिए अद्भुत था। शुरुआत में जहां दस लोग भी दिखाई नहीं दे रहे थे, वहीं कुछ ही समय बाद महिलाओं, पुरुषों, युवाओं और बच्चों की बड़ी संख्या रथयात्रा में शामिल हो गई। णमोकार महामंत्र की गूंज, श्रीजी के जयकारे और भक्ति से भरे चेहरों ने यात्रा को भव्यतम स्वरूप प्रदान कर दिया। यह केवल रथ का आगे बढ़ना नहीं था, यह विश्वास का आगे बढ़ना था। माताजी ने परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय धर्म और संकल्प को प्राथमिकता दी। उन्होंने श्रद्धालुओं के मन में यह विश्वास जगाया कि धर्म की यात्रा मौसम की अनुकूलता की मोहताज नहीं होती। जहां भावना सच्ची हो, वहां बाधाएं भी मार्ग छोड़ देती हैं। बारिश का आना और फिर यात्रा के आगे बढ़ते ही उसका थम जाना श्रद्धालुओं के लिए किसी अविस्मरणीय आध्यात्मिक अनुभूति से कम नहीं था। उस क्षण ने उपस्थित हर व्यक्ति के मन में माताजी के संकल्प के प्रति श्रद्धा को और गहरा कर दिया।

संत का संकल्प स्वयं में एक प्रेरणा होता है

गणिनी आर्यिका श्री संगममति माताजी का जीवन त्याग, तप, संयम और धर्मप्रभावना की साधना है। उनके मंगल सान्निध्य में 35 दिनों तक णमोकार महामंत्र की आराधना हुई और अंतिम दिन वही साधना रथयात्रा के रूप में नगर की गलियों तक पहुंची। यह रथयात्रा मानो संदेश दे रही थी- श्रद्धा हो तो कदम रुकते नहीं, संकल्प हो तो रास्ते झुकते हैं और धर्म के प्रति समर्पण हो तो परिस्थितियां भी छोटी लगने लगती हैं। शनिवार को अंबाह ने इस भावना को केवल देखा नहीं, जिया। बारिश ने यात्रा रोकने का प्रयास किया, लेकिन माताजी के संकल्प ने श्रद्धालुओं को आगे बढ़ाया। शुरुआत में कुछ कदम थे, फिर कारवां बना और देखते ही देखते वह कारवां भव्य धार्मिक यात्रा में परिवर्तित हो गया।

यह माताजी की वाणी का प्रभाव था कि संकोच श्रद्धा में बदला, श्रद्धा सहभागिता में बदली और सहभागिता ने रथयात्रा को भव्यता प्रदान कर दी। श्रीजी के रथ के साथ चलते श्रद्धालु केवल नगर की सड़कों से नहीं गुजर रहे थे, वे अपने भीतर भी एक यात्रा कर रहे थे-राग से विराग की ओर, अस्थिरता से संयम की ओर और संसार से आत्मकल्याण की ओर। शनिवार की वह रथयात्रा इसलिए याद रहेगी कि उसमें केवल रथ नहीं चला था...उस दिन अंबाह में श्रद्धा चली थी, विश्वास चला था, संकल्प चला था और सबसे आगे धर्म चला था। गणिनी आर्यिका श्री संगममति माताजी ससंघ के चरणों में कोटिशः नमन। आपके मंगल सान्निध्य में अंबाह ने जो देखा, वह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था की वह अनुभूति थी जिसे शब्दों में पूरी तरह बांध पाना संभव नहीं।