धरियावद। सम्यक दृष्टि जीव गणवान पुरुषों की सेवा और वैयावृत करता है। वैयावृत में छोटे-बड़े का भेद नहीं करते हैं। आचार्य परमेष्ठी भी छोटे से छोटे साधु की भी सेवा, वैयावृत करते हैं और मन, वचन, काय से कृत-कारित अनुमोदना करते हैं। यह विचार दिगंबर जैन आचार्य कल्प पुण्य सागर जी महाराज ने धरियावद नगर के महावीर वाटिका में चल रहे 48 दिवसीय श्री भक्तामर विधान मंडल पूजन आराधना के 37वें दिन रविवार को आयोजित प्रातःकालीन धर्मसभा को संबोधित करते हुए प्रकट किए। आचार्य कल्प पुण्य सागर जी महाराज ने कहा कि वैयावृत द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के अनुसार संयमी (साधु) की प्रकृति एवं आवश्यकता को देखकर एक मां की ममता के अनुसार करना चाहिए। वैयावृत विवेक के साथ करना आवश्यक है। वैयावृत करने वाला प्राणी जीवन में कभी भी दुख का अनुभव नहीं करता है। जो श्रावक-श्राविकाएं साधु और संयमी जीवन के प्राणियों की सेवा करते हैं, तो साधुओं के जीवन का पुण्य कुछ अंश तक श्रावक-श्राविकाओं के खाते में अवश्य जाता है। अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य के अनुसार वैयावृत करने वाला जीव विपुल पुण्य को प्राप्त करता है। वैयावृत निर्धारित समय पर और मौनपूर्वक करना चाहिए।

14 पुण्यार्जक परिवारों ने पूजा की

आचार्य श्री ने कहा कि बहुएं सास की वैयावृत करें, पुत्र-पुत्री एवं पौते-पौती अपने दादा-दादी की वैयावृत करें तो उनको आशीर्वाद मिलता है। उससे असीम और अक्षुण्ण फल की प्राप्ति होती है। वैयावृत करने वाला जीव एक ना एक दिन अवश्य ही तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर संसार से मुक्त होकर मोक्ष पथ पर अग्रसर हो सिद्धालय में विराजमान हो जाता है। भक्तामर विधान के 37 वें दिन रविवार को 14 पुण्यार्जक परिवारों ने पूजा कर धर्म लाभ लिया। धर्म सभा में बड़ी संख्या में श्रावक और श्राविका उपस्थित रहे। यह जानकारी श्रीफल साथी अशोक कुमार जेतावत ने दी। धर्मसभा में आगंतुक अतिथियों का स्वागत अभिनंदन सागरमल बोहरा, अरविंद पचौरी, दिनेश जैकणावत, महावीर प्रसाद सुंदरोत और अन्य समाजजनों ने किया।

पाठशाला का संचालन

वर्षायोग स्थल महावीर वाटिका में संघस्थ मुनि श्री उपदेश सागर जी महाराज के सान्निध्य में प्रत्येक शनिवार और रविवार को संध्याकालीन पाठशाला का संचालन किया जा रहा है। आचार्य श्री की प्रेरणा से मुनि श्री बच्चों को जैन आगाम की शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। धरियावद के बालक एवं बालिकाएं बड़ी संख्या में भाग ले रहे हैं।