धरियावद। 48 दिवसीय भक्तामर महामंडल विधान के अंतर्गत बुधवार को आयोजित प्रवचन में आचार्य कल्प पुण्यसागर जी महाराज ने बहुश्रुत भक्ति भावना पर प्रकाश डालते हुए उपाध्याय परमेष्ठी के स्वरूप, महत्त्व और उनके ज्ञानोपकार को विस्तार से समझाया। महाराज ने कहा कि नमोकार महामंत्र के चौथे पद णमो उवज्झायाणं के माध्यम से हम उपाध्याय परमेष्ठी को नमन करते हैं। ग्यारह अंग और पूर्वों के ज्ञाता तथा जिनवाणी के गहन अध्येता होने के कारण उपाध्याय परमेष्ठी को बहुश्रुत कहा जाता है। वे शिष्यों को जिनागम के रहस्यों का ज्ञान मधुर वाणी से कराते हैं। उन्होंने कहा कि आचार्य परमेष्ठी की भक्ति से चारित्र की विशुद्धि होती है, जबकि उपाध्याय परमेष्ठी की भक्ति से ज्ञान की वृद्धि और अज्ञान का नाश होता है। जैसे मां प्रेम और वात्सल्य से बच्चे को भोजन कराती है, उसी प्रकार उपाध्याय अपने शिष्यों को मधुर वाणी के माध्यम से ज्ञान का अमृतपान कराते हैं।

अनेकांत की शक्ति से जैन दर्शन की प्रभावना

प्रवचन में उन्होंने कहा कि उपाध्याय परमेष्ठी के पास तत्व, पदार्थ और द्रव्यों का गहन ज्ञान होता है। अनेकांत और न्याय के बल पर वे कठिन से कठिन शास्त्रार्थ में भी सत्य की स्थापना करने में समर्थ होते हैं। जैन दर्शन की सबसे बड़ी शक्ति उसका अनेकांतवाद और विशाल शास्त्र-साहित्य है। अनेक विद्वानों और आचार्यों ने इसी ज्ञान-परंपरा के बल पर जैन सिद्धांतों की प्रभावी स्थापना की। उन्होंने कहा कि विनम्र व्यक्ति ही वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकता है। अहंकार ज्ञान के मार्ग में बाधा है, जबकि विनय विद्या प्राप्ति का द्वार है। उपाध्याय परमेष्ठी का उद्देश्य यही होता है कि कोई भी भव्य जीव अज्ञान के अंधकार में न रहे।

जिनवाणी और शास्त्रों की सेवा ही बहुश्रुत भक्ति

महाराज ने बताया कि उपाध्याय परमेष्ठी जिनवाणी और आगम ग्रंथों के संरक्षण, अध्ययन और लेखन की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। इसलिए उनके प्रति भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें योग्य आहार देना, शास्त्र उपलब्ध कराना, शांत एवं अध्ययन योग्य वातावरण उपलब्ध कराना तथा जिनवाणी का स्वाध्याय करना भी बहुश्रुत भक्ति है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि जिनवाणी की आराधना, शास्त्रों का वाचन और ज्ञानियों की सेवा को जीवन का हिस्सा बनाएं। इससे सम्यक ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होगा।

नौ परिवारों ने भक्तामर विधान में किया पुण्यार्जन

इस अवसर पर अड़तालीस दिवसीय भक्तामर महामंडल विधान में नौ पुण्यार्जक परिवारों ने सहभागिता कर भक्ति भावपूर्वक मंडप पर अर्घ समर्पित किए। आचार्यश्री ने सभी पुण्यार्जक परिवारों को मंगल आशीर्वाद देते हुए उनके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और धर्ममय उन्नति की कामना की।