कुण्डलपुर। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि जीवन एक कहानी है और इस कहानी को ध्यान से सुनने की आवश्यकता है। संसार की कहानियां जहां मनुष्य को सुला सकती हैं, वहीं जिनवाणी और ज्ञानी गुरु की वाणी मोह की नींद से जगाकर आत्मचेतना की ओर ले जाती है। हम सभी का जीवन भी एक कहानी है।

कहानी संस्कार और जीवन-दृष्टि का माध्यम

राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्र प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री ने ‘What is Life?’ श्रृंखला में ‘Life is a Story’ विषय पर कहा कि कहानी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कार और जीवन-दृष्टि देने का प्रभावी माध्यम है।

बचपन में दादी-नानी की कहानियों से बच्चों को संस्कार मिलते हैं, वहीं जिनवाणी की कथा मनुष्य को जागृत करने का कार्य करती है। जीवन की सच्ची गाथा उसी से सुननी चाहिए, जिसने उस मार्ग को स्वयं जिया हो।

मां से सुनीं धर्म कथाएं, पिता करते थे पद्मपुराण की वाचना

अपने बाल्यकाल के संस्मरण साझा करते हुए मुनि श्री ने कहा कि उन्होंने अपनी मां से जिनवाणी और धर्म से जुड़ी कथाएं सुनीं। मां चित्रों के माध्यम से धार्मिक प्रसंग समझाती थीं, जबकि पिता पद्मपुराण की वाचना करते थे।

राम-रावण की कथा सहित धार्मिक प्रसंगों को सुनते-सुनते धर्म के संस्कार कब जीवन का हिस्सा बन गए, इसका पता ही नहीं चला। उन्होंने कहा कि प्रत्येक कहानी में पात्र, घटनाक्रम, संघर्ष और निष्कर्ष होता है। इसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी अनेक चरणों से होकर गुजरता है।

बचपन से वृद्धावस्था तक जीवन की यात्रा

मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य का जीवन बचपन, यौवन, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था से गुजरता है। बचपन संस्कारों की नींव रखता है, यौवन इच्छाओं और कर्तव्यों के संघर्ष से गुजरता है, प्रौढ़ावस्था में अनुभव विवेक में बदलता है और वृद्धावस्था मनुष्य को आत्मचिंतन तथा शांति की ओर ले जाने का अवसर देती है।

उन्होंने कहा कि जीवन के प्रत्येक चरण के संस्कार और अनुभव आगे की दिशा निर्धारित करते हैं। इसलिए जीवन को केवल समय बीतने के रूप में नहीं, बल्कि आत्मविकास के अवसर के रूप में देखना चाहिए।

जीवन की नाव को सही दिशा देना जरूरी

मुनि श्री ने नदी में आई बाढ़ की कथा के माध्यम से जीवन की दिशा समझाई। जलप्रपात की ओर तेजी से बढ़ रही नाव में एक व्यक्ति भोजन-सामग्री बचाने लगा, दूसरा सोने-चांदी के आभूषण समेटने लगा और तीसरा दूसरों को दोष देता रहा। चौथे व्यक्ति ने पतवार संभाली और नाव को किनारे की ओर मोड़ दिया।

मुनि श्री ने कहा कि संसार में मनुष्य भी धन, सुख-सुविधाओं और परस्पर दोषारोपण में उलझकर यह भूल जाता है कि जीवन की नाव मृत्यु की ओर बढ़ रही है। धर्म और सही पुरुषार्थ ही जीवन की नाव को मोक्ष के किनारे की ओर ले जा सकते हैं।

महापुरुषों की जीवनगाथाएं श्रवण और अनुकरण योग्य

मुनि श्री ने पूर्व आचार्यों का स्मरण करते हुए कहा कि आचार्य विद्यासागर जी महाराज जैसे महापुरुषों के जीवन में संस्कारों की शक्ति स्पष्ट दिखाई देती थी। तीर्थंकर आदिनाथ भगवान से लेकर भगवान महावीर स्वामी तक महापुरुषों की जीवनगाथाएं वास्तव में श्रवण और अनुकरण योग्य हैं। उनके त्याग, तप, संयम और साधना को समझकर जीवन में उतारने से हमारा अपना जीवन भी दूसरों के लिए प्रेरणा बन सकता है।

आचार्य विद्यासागर का जीवन त्याग और संयम की अमर कथा

गुरुवर आचार्य विद्यासागर जी महाराज के जीवन को आदर्श बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि उनका जीवन त्याग, तपस्या और संयम की ऐसी अमर कथा है, जिसे केवल सुनना ही नहीं, बल्कि जीवन में उतारना भी चाहिए।

उन्होंने कहा—

“त्याग-तपस्या, संयम-तप में बीती भरी जवानी है,

विद्याधर से विद्यासागर तक की अमर कहानी है।”

त्याग और आत्मजागरण की कथा युगों तक देती है दिशा

मुनि श्री ने कहा कि संसार की कहानी धन, पद और प्रतिष्ठा पर समाप्त हो जाती है, लेकिन त्याग, संयम, तप और आत्मजागरण से लिखी गई जीवन-कथा युगों तक समाज को दिशा देती रहती है। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन को ऐसी प्रेरक गाथा बनाने का पुरुषार्थ करना चाहिए, जो आत्मकल्याण के साथ दूसरों को भी धर्ममार्ग की प्रेरणा दे।