आगरा। निर्मल सेवा सदन, छीपीटोला में पट्टाचार्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी शिष्य मुनि श्रीसमत्व सागरजी महाराज श्रमण मुनि श्री शील सागर महाराज, श्रमण मुनि श्री सुप्रभात सागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में धर्म सभा का शुभारंभ आचार्य विराग सागर जी महाराज के चित्र अनावरण और मुनि श्री के पाद प्रक्षालन कर पदाधिकारियों ने किया। मुनि श्री समत्व सागर जी ने कहा कि हर जिनालय में आपने वह आत्मकथा देखी है। हर जिनालय में वह आत्मकथा बनी होती है। जब आपने उसमें काव्यात्मक शैली में उसे आत्मकथा को सुना तो बिल्कुल ऐसा लग रहा था कि उस व्यक्ति की हालत क्या रही होगी, जिसके पीछे सिंह ही पड़ा हुआ है। जिसके पीछे हाथी पड़ा हुआ है। पहले तो कई बार हमने सुना है कि आसमान से टपके तो खजूर पर अटके। यह बात आपने सुनी है, लेकिन आपके जीवन में दिन-प्रतिदिन घटित होती है। एक घटना के बाद दूसरी घटना आपके सम्मुख होती है और यही तो कहती है कि देख लो, कितनी बार तुमने ये आत्मकथाएं देखीं, लेकिन अपने जीवन की कथा को पढ़ नहीं पा रहे हो, अपनी आत्मकथा को जान नहीं पा रहे हो।
संसार चक्र का दर्शन तुम्हें कभी प्रभावित नहीं कर पाया
वैराग्य की भावनाओं को पढ़ते हुए वैराग्य से दूर हैं। वैराग्य की घटनाओं को देखते हुए भी वैराग्य की भावनाओं को बारह भावनाओं को समझ नहीं पाए। क्या हमारे अंदर कठोरता नहीं है वैराग्य की भावनाओं को पढ़ा। वैराग्य की बारह भावनाओं को पढ़ा किंतु एक भी बार बारह भावना, वैराग्य भावना, संसार चक्र का दर्शन तुम्हें कभी प्रभावित नहीं कर पाया। कितनों को जला के आ गए, फिर से भोजन करने लग गए। अभी तक तो वे बारह भावनाएं मुझे पढ़ने में आती थीं लेकिन विगत कुछ तीन साल, चार साल पहले और छह साल पहले की घटना कैसे समय बीतता है। आप सोच सकते हैं? 21 तक का जो काल रहा, 20 और 21 का जो भयावह काल इस संसार में देखा, अगर उस भयावह काल को देखते हुए भी इस जीव को जिनेंद्र भगवान की वाणी पर श्रद्धान नहीं हो पा रहा, तो अब कोई तुम्हारे जीवन में परिवर्तन लाने की कोई स्थिति नहीं कर सकता। अभी तक तो सुनते थे बारह भावनाओं को, लेकिन बारह भावनाएं देखी नहीं क्या? क्या अशरण भावना आपको नहीं दिख रही थी? क्या अनित्य भावना स्पष्ट नहीं दिख रही थी?
साथ में बैठा था, शाम को वह नहीं दिखता है
जिनको जाना था वे तो यहाँ अभी तक हैं, ऐसा सोचते हैं कि अपना तो वृद्ध अवस्था में ही मरण होगा, लेकिन जिनको नहीं जाना था, वे राजे हों, महाराजे हों, बड़े पैसे वाले हों, यानी वे सब, वे सब के सब इस कालचक्र के जो कालकूट जहर के समान है, जिसे खाने के बाद कोई नहीं बचता है, वे सब चले गए। बड़े-बड़े शूरवीर, बड़े-बड़े पैसे वाले लेकिन, अनित्य भावना क्या कहती थी? यही तो कहती थी, जिससे सुबह हँस के, मुस्कुरा के बात होती थी, सुबह से वह बिल्कुल स्वस्थ था, मेरे साथ में बैठा था, शाम को वह नहीं दिखता है।ढूँढता है जब मरण का समय आता है, ढूँढता है कोई स्थान मिल जाए, ढूँढता तो है स्थान मिल जाए, लेकिन शरण देने वाला कोई नहीं था। करोड़ों हाथ में थे, लेकिन एक बिस्तर, एक ऑक्सीजन का सिलेंडर तुम्हें पूछने वाला नहीं था। सोचा कि घर पर जाऊँगा तो घर पर आए, तो पिता ने कहा, "बेटा, तुझे बाहर ही रहना है, अंदर नहीं आना है।" पिता अंदर आ रहा था तो बेटा कहता है, "नहीं, आप बाहर ही रहेंगे।" यानी यहाँ तक कि पहले तो यह सुना था जो पिता और बेटे... पिता और बेटे का संबंध जो रहता है, जीवन पर्यंत नहीं रहा, लेकिन मरण के समय मुखाग्नि देने बेटा आ जाता है। यानी समझो, मुखाग्नि देने बेटा आ जाता है, किंतु कोरोना काल तो ऐसा था जिसमें बेटा भी मुखाग्नि देने नहीं जा रहा था।
हम किस ओर भाग रहे हैं? यह सारी की सारी अनित्य भावना
ज्ञानियों, समझो केवल मुखाग्नि देने के काम के तुम न रह जाओ, कम से कम जीवित हो के अपने अंदर धर्म की भावनाएं प्रकट कर लो। अपने पिता को मात्र अंतिम समय मत देखना, अपने पिताओं को पहले भी देखना प्रारंभ कर दो। यही तो धर्म सिखा रहा है। हम किस ओर भाग रहे हैं? यह सारी की सारी अनित्य भावना, यह सब एकत्व, अन्यत्व भावना आपको दिखाई दे रही थी। पूरी-पूरी अन्यत्व भावना दिखाई दे रही थी, कोई किसी का नहीं दिख रहा था। सब अलग-अलग रहो भाई, दूर-दूर रहो, कोई किसी का संबंधी नहीं, सबको अपने-अपने दुख भोगना है। कष्ट आते हैं न, तो जीव बिलखता है, रोता है।
जिनेंद्र भगवान की परम औषधि
जिसके एक भी वैद्य नाड़ी तो पकड़ता है, औषधि भी देता है, लेकिन मैं देखता हूँ, एक भी वैद्य तुम्हारे कष्ट को दूर नहीं कर सकता। एक ही मात्र वैद्य हैं नितिन जी, एक ही वैद्य हैं और उनकी औषधि हम खाना नहीं चाहते हैं, इसलिए बहुत पीड़ा में जीवन जीते हैं। वे हैं जिनेंद्र भगवान की परम औषधि। उनकी वाणी यदि मेरे अंदर में चली जाती, तो कष्ट नहीं होता। पक्की बात है, भैया जी, यह बात पक्की है कि जो जिनेंद्र भक्ति करता है, उसका समाधि मरण श्रेष्ठ होता है। मंच संचालन पंडित सतेंद्र जैन साहूला ने किया।
यह समाजजन मौजूद रहे
इस मौके पर श्रुत मंथन वर्षायोग समिति के मनोज जैन, रमेश जैन, प्रवीण जैन (पद्मावती ज्वैलर्स), शैलेश जैन, मुकेश जैन, विवेक जैन, चक्रेश जैन, राजीव जैन, सचिन जैन, आशु जैन (वी.के), विजय जैन शास्त्री, आशु बाबा, अनिकेत जैन, रोहित जैन, नितिन जैन,सतेंद्र जैन, सोनू), देवेंद्र जैन, मुरारी लाल जैन, दीपक जैन, गौरव जैन, मुन्ना लाल जैन, संभव जैन, मीडिया प्रभारी राहुल जैन समस्त मंडल एवं सकल जैन मौजूद था ।




