आगरा। निर्मल सेवा सदन, छीपीटोला में आचार्य भगवन श्री विशुद्ध सागर जी के तीन शिष्य मुनि श्री समत्व सागर जी, मुनि श्री शील सागर जी, मुनि श्री सुप्रभात सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में धर्मसभा का शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर पदाधिकारियों ने आचार्य विराग सागर जी के चित्र अनावरण और मुनिश्री का पाद प्रक्षालन किया। मुनि श्री समत्व सागर जी ने अपनी अमृतमयवाणी से कहा कि हर व्यक्ति अपने आप को दूसरों के सामने स्थापित करना चाहता है। वह चाहता है कि वह जहां भी जाए और जिस स्थान पर भी वह जाए, उसकी जय-जयकार हो, उसको लोग जानें, उससे मिलें और कभी भी वह अकेला इस संसार में नहीं रहना चाहता है। फिर भी आज की जो परिस्थितियां हैं। हर व्यक्ति परेशान है, अकेला है और समझ नहीं पा रहा है कि करूं तो करूं क्या? आखिर यह स्थिति बन क्यों रही है? अगर इसका विचार कर लें तो हमारे साथ यह स्थिति न बने, यह कैसे संभव होगा? आखिर मुझे क्या परिवर्तन चाहिए जिससे कि मेरे से लोग प्रभावित रहें और मेरे हर समय मेरे साथ उपस्थित रहें? अगर यह सीख लेता हूं, तो शायद मैं कभी भी ऐसी स्थिति में नहीं पहुंचूंगा जहां मेरे साथ कोई नहीं होगा।

मुनिश्री ने कहा कि आज मुझे वह विद्या सीखनी है जो यह निर्धारित करेगी कि मुसीबतों में तुम्हारे साथ कौन रहेगा। हमेशा यही समस्या देखी जा रही है-भाई-भाई का साथ देने तैयार नहीं है, सगा-संबंधी मुसीबत के समय मुख मोड़ लेता है, अच्छे से अच्छा मित्र भी आपका साथ नहीं देता है। यह क्यों होता है? क्योंकि हम जिन लोगों के बीच में रहते हैं, उनको तभी देखते हैं जब हमें उनसे आवश्यकता होती है। हम परिवार वालों को तभी पूछते हैं, हम संबंधियों से तभी अच्छे से व्यवहार निभाते हैं जब हमें उसकी आवश्यकता होती है, किन्तु भूल जाते हैं जब हमारे दिन आते हैं।

विपरीत परिस्थितियां आएं और साथ में लोग खड़े हों तो बड़ा आनंद

जब आपने अपने स्वार्थ में देखा था तो वह व्यक्ति भी आपको जब आपकी मुसीबत के दिन आएंगे, तो वह उसे नहीं देख पाएगा। सब लोग चाहते हैं कि ऐसे दिन मेरे साथ नहीं आएं, ऐसी विपरीत परिस्थितियां न आएं। और विपरीत परिस्थितियां आएं भी और साथ में लोग खड़े हों तो बड़ा आनंद है। अपने घर वाले, संबंधी, मित्र गण अगर आपके साथ हैं तो एक सहानुभूति मिलती है, संवेदनाएं होती हैं। वे संवेदनाएं जब तक रहती हैं, सहानुभूति जब तक मिलती रहती है, व्यक्ति हार नहीं मानता है। व्यक्ति के अंदर वह उत्साह शक्ति पुनः जाग्रत हो जाती है यदि कोई हाथ देने वाला मिल जाए और पीठ थपथपाने वाला मिल जाए।

धन-संपत्ति-वैभव के साथ साझा करने वाला कोई नहीं

किन्तु आज हर व्यक्ति टूटा हुआ है। हर व्यक्ति के अंतरंग में कहीं ना कहीं एक ऐसी कसमकस सी छाई हुई है कि वह समझ ही नहीं पा रहा है कि मैं इस परिस्थिति से बाहर कैसे आऊं। लोग मुस्कुराने के लिए भी स्थान ढूंढते हैं अथवा ।प् से बात कर लेते हैं। हां, मुस्कुराने के लिए भी लोग अब स्थान ढूंढ रहे हैं, उनके पास कुछ नहीं बचा है। मां आपके ही बच्चे जो बाहर जा रहे हैं, उनसे पूछना सुबह से लेकर शाम तक जीवन तो चल रहा है लेकिन, पैसे भी कमाए जा रहे हैं, धन-संपत्ति-वैभव सब है, लेकिन उस धन-संपत्ति-वैभव के साथ उन्हें साझा करने वाला कोई दिखाई नहीं दे रहा है बहुत अच्छे पहले के दिन हुआ करते थे। श्रद्धेय जी, पहले के दिन बड़े अच्छे होते थे।

बड़े अच्छे-अच्छे सोफे हैं, लेकिन बैठने वाला कोई नहीं

त्योहारों में लोग एक-दूसरे के घर जाया करते थे। त्योहारों में एक-दूसरे के पास जाते थे, मात्र समय आने पर नहीं जाते थे, बहुत दिनों से बैठने नहीं गए हैं तो बैठने जाया करते थे। आज बड़े-बड़े भवन बना लिए गए, बहुत अच्छे बैठने की व्यवस्थाएं हैं, देखिए मां, आप सबके भवनों में बड़े अच्छे-अच्छे सोफे हैं, लेकिन बैठने वाला कोई नहीं है।

संबंधों की मधुरता और व्यवहारिकता कितनी प्रासंगिक थी

बैठक बहुत अच्छी-अच्छी बन गई हैं, लेकिन बैठने वालों से आपकी दूरियां हो गई हैं। अगर 6-7 दिन, 8 दिन किसी के यहां नहीं जाया जाता था ना, तो लोगों को लगता था कि क्या हो गया भाई, बहुत दिनों से आप आए नहीं हैं। और आज अगर मिलने जाना हो तो फोन किया जाता है। घर के सगे-संबंधी से, अपनी बहन से मिलने जाना हो, तो भाई-भाई फोन करता है कि ‘बहन, आ जाऊं?’ वह कहती है, नहीं भैया, अभी नहीं, दो दिन बाद देखना, आज यह व्यस्तता है। यानी समझो, यह संबंधों की मधुरता और व्यवहारिकता कितनी प्रासंगिक थी और कितने जीवन को सुखद अनुभूतियां देने वाली थी, वह सब भूलते जा रहे हैं।

लोगों को हमेशा-हमेशा स्थित कर सकती हैं

इसलिए परिवर्तन की इस नई दिशा की ओर जब हमने कदम उठाना सीखा, तो जिनेन्द्र भगवान यह भी कह रहे हैं कि मात्र बाहरी प्रवचन नहीं कर रहा हूं मैं, लेकिन आपके जीवन में महावीर भगवान के उपदेश, महावीर भगवान के द्वारा दिया गया यह धर्म के संस्कार, व्यवहारिकता कितना कुछ परिवर्तन ला सकती हैं और आपके साथ में लोगों को हमेशा-हमेशा स्थित कर सकती हैं। यदि यह विचार आपके मन में नहीं आया ना, और यह परिवर्तन नहीं आया, तो जिस तरह से आज दुख के दिनों में भी अपना बेटा नहीं आता है, क्यों समाज में अगर आवश्यकता पड़ जाए तो समाज के बंधु आपके साथ नहीं आ रहे हैं।

अपनी छवि सुधाइए, सब साथ होंगे

अगर धन की हानि हो जाए तो धन देने तैयार नहीं हैं, क्योंकि आपने अपने विश्वास को ऐसा किया ही नहीं, आपकी छवि को ऐसा नहीं बनाया जिससे कि लोग आपके साथ जुड़ सकें। आपका व्यवहार किसी को फूटी आंखों पसंद नहीं करता। आपका व्यवहार ऐसा है कि ‘कोई मैं हूं तो कोई है ही नहीं’, ‘मेरा काम बनना चाहिए’। मंच संचालन सतेंद्र जैन साहूला ने किया।

कार्यक्रम में यह उपस्थित रहे

इस मौके पर श्रुत मंथन वर्षायोग समिति के मनोज जैन, रमेश जैन, प्रवीण जैन (पद्मावती), आनंद जैन, शैलेश जैन (लाला जी), मुकेश जैन, रमेश जैन, आशीष जैन, विवेक जैन, चक्रेश जैन, सतेंद्र जैन (साहुला),आशीष जैन (बाबा), सचिन जैन(तार),राजीव जैन, आशु (वीके), रोहित जैन, नितिन, सनी मीडिया प्रभारी राहुल जैन मौजूद थे।