अंबाह। जैन धर्म की कठिन तपस्या, त्याग और वैराग्य की अनुपम परंपरा का भावपूर्ण दृश्य गुरुवार को जैन बगीची में देखने को मिला। परम पूज्य गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री संगम मति माताजी ससंघ के पावन सान्निध्य में क्षुल्लिका सानिध्यमति माताजी द्वारा केशलोंच किया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने कठिन साधना के दर्शन कर धर्मलाभ प्राप्त किया और त्याग, संयम तथा आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा ली।
शरीर के मोह से मुक्त होने की साधना है केशलोंच
पूज्य संगम मति माताजी ने बताया कि जैन धर्म में केशलोंच को त्याग और वैराग्य की महत्वपूर्ण साधना माना जाता है। सांसारिक आकर्षण और शरीर के प्रति मोह को त्यागने की भावना के साथ साधु-संत अपने केशों का लोचन करते हैं।
उन्होंने कहा कि यह साधना केवल बाहरी त्याग नहीं है, बल्कि मन के भीतर मौजूद मोह, ममता, राग-द्वेष और सांसारिक बंधनों को छोड़कर आत्मा की ओर अग्रसर होने का संदेश भी देती है।
कठिन साधना देख भावविभोर हुए श्रद्धालु
जैन बगीची में आयोजित इस धार्मिक अवसर पर वातावरण भक्तिमय और आध्यात्मिक बना रहा। क्षुल्लिका सानिध्यमति माताजी की कठिन तपस्या और संयम को देखकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
श्रद्धालुओं ने कहा कि आज के भौतिकवादी युग में जहां व्यक्ति छोटी-छोटी सुविधाओं के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर पाता, वहीं जैन साधु-संत कठोर त्याग और तप को अपने जीवन में उतारकर समाज को संयमित जीवन की प्रेरणा दे रहे हैं।
वास्तविक सुख आत्मशांति और संयम में
परम पूज्य गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री संगम मति माताजी ससंघ के सान्निध्य में चल रहे धार्मिक आयोजनों के बीच केशलोंच का यह अवसर श्रद्धालुओं के लिए विशेष रूप से प्रेरणादायी रहा।
श्रद्धालुओं ने माताजी के चरणों में श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा कि संतों और आर्यिकाओं का तपस्वी जीवन यह सीख देता है कि वास्तविक सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और आत्मसंयम में है।
त्याग और वैराग्य की परंपरा हुई जीवंत
केशलोंच के माध्यम से क्षुल्लिका सानिध्यमति माताजी ने जैन धर्म की त्याग और वैराग्य की परंपरा को जीवंत किया। अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, संयम और तप के मार्ग पर चलते हुए आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना जैन साधना का प्रमुख उद्देश्य है। साधु-संतों का जीवन इन्हीं सिद्धांतों का प्रत्यक्ष उदाहरण माना जाता है।
श्रद्धालुओं ने लिया संयम और सदाचार का संकल्प
इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने शांतिपूर्वक धार्मिक कार्यक्रम में सहभागिता कर क्षुल्लिका सानिध्यमति माताजी की तपस्या के दर्शन किए। उपस्थित समाजजनों ने अपने जीवन में अधिक से अधिक संयम, त्याग और सदाचार अपनाने का संकल्प लिया।
अंबाह में बना धर्म, ध्यान और तप का वातावरण
श्रद्धालुओं ने कहा कि पूज्य संगम मति माताजी ससंघ के सान्निध्य में अंबाह में निरंतर धर्म, ध्यान, तप और आत्मकल्याण का वातावरण निर्मित हो रहा है। इसी आध्यात्मिक वातावरण में क्षुल्लिका सानिध्यमति माताजी का केशलोंच समाज के लिए त्याग, तप और वैराग्य का प्रेरणादायी संदेश बनकर सामने आया। जैन बगीची में उपस्थित श्रद्धालुओं ने इस पावन अवसर को अपने जीवन का अविस्मरणीय धार्मिक क्षण बताया।




