दिल्ली ऋषभ विहार। दिल्ली ऋषभ विहार में विराजित पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने धर्मसभा में कहा कि अपनों से सावधान रहो। जीवन में संभलकर जीना, क्योंकि अपने ही अपनों का घात करते हैं। जब व्यक्ति के राग की पुष्टि नहीं होती है तो अपने सगे ही रात्रु बन जाते हैं। एक शत्रु भी बहुत होता है, जीवन में अशांति के लिए। एक कांटा भी कष्ट देता है। फूल बनकर जीवन जियो। शूल मत बनो।

उपयोगी बनो आफत नहीं
आचार्य श्री विशुद्धसागर जीके परम भक्त वैभव जैन बडामलहरा ने बताया कि आचार्य श्री ने अपने प्रवचन में कहा कि उपहार बनो, आफत नहीं। जीवन में उपहार बनना सीखो। दूसरों के लिए उपयोगी बनो। आफत मत बनो। जीवन में सहयोगी बनो, विकास करो। लड़ो मत, आगे बहुत बढ़ो। सच्चा इंसान वही है, जो परोपकारपूर्ण जीवन जीता है। दान, पुण्य करो जोड-जोड़ कर बनो। परिग्रही मत बनो और जीवन में हमेशा तैयार रहो।
अपराध का कारण राग
जीवन ओस की बूंद के समान क्षणभंगुर है। यौवन क्षणिक है, देह नश्वर है। किसके जीवन में कब क्या होगा? पता नहीं। आयु पूर्ण होने पर कोई भी वैद्य, मंत्र तंत्र, और औषधि बचा नहीं पाएगी। हर-पल जाग्रति के साथ जियो। जीवन का अंत निश्चित है। जियो और जीने दो। राग वह आग है, जो झुलसा देती है। राग का अंधा महा अंधा होता है। राग का रागी ही अपराध करता है। धन का राग, धरती का राग, स्त्री का राग, जाति का राग, संप्रदाय का राग, कुल का राग बहुत खतरनाक होता है। जहां राग होगा, वहीं द्वेष होगा। राग भी हितकर नहीं, द्वेष भी हितकर नहीं। एक मात्र वीतराग भाव ही हितकारी है।



