मुरैना। बड़े जैन मंदिर में पर्युषण पर्व के अंतर्गत चल रही दस धर्मों की आराधना के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म पर धर्मसभा हुई। आचार्यश्री उदारसागर जी महाराज ने कहा कि मार्दव का अर्थ मन में कोमलता, व्यवहार में विनम्रता और अहंकार का त्याग है। मनुष्य को विनम्रता को जीवन का आभूषण बनाना चाहिए।
‘मैं’ और ‘मेरा’ का भाव बढ़ने पर जन्म लेता है अहंकार
आचार्यश्री ने कहा कि व्यक्ति के भीतर जब ‘मैं’ और ‘मेरा’ का भाव बढ़ता है, तब अहंकार जन्म लेता है। अहंकार मनुष्य को स्वयं को दूसरों से बड़ा समझने की भूल कराता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य धन, पद, रूप, ज्ञान, प्रतिष्ठा, जाति-कुल और परिवार को लेकर अभिमान करने लगता है, जबकि संसार की कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है। शरीर, धन और पद—सभी परिवर्तनशील हैं।
आचार्यश्री ने कहा, “जिसे अपने होने का अहंकार कम होता जाता है, उसके भीतर आत्मा की पहचान बढ़ती जाती है।”
‘विनम्रता कमजोरी नहीं, आंतरिक शक्ति की पहचान’
धर्मसभा में मुनि श्री उपशांतसागर जी महाराज ने कहा कि मार्दव धर्म किसी को छोटा समझने के बजाय प्रत्येक व्यक्ति के प्रति सम्मान का भाव रखने की शिक्षा देता है। विनम्रता कमजोरी नहीं है, बल्कि विनम्र व्यक्ति ही अपने भीतर की वास्तविक शक्ति को पहचान पाता है।
उन्होंने प्रकृति का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस वृक्ष पर अधिक फल लगते हैं, उसकी डालियां उतनी ही झुकती हैं। इसी प्रकार जिस व्यक्ति में वास्तविक ज्ञान, गुण और संस्कार होते हैं, उसके व्यवहार में अधिक विनम्रता दिखाई देती है।
ज्ञान अहंकार नहीं, विनम्रता बढ़ाए
मुनिश्री ने कहा कि केवल ज्ञान प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है। ज्ञान के साथ यदि अहंकार बढ़ता जाए तो वह आत्मकल्याण का माध्यम नहीं बन पाता। सच्चे ज्ञान की पहचान यही है कि वह व्यक्ति को सरल और विनम्र बनाए।
‘मैं’ को कम कर ‘हम’ को बढ़ाएं
आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को उत्तम मार्दव धर्म को दैनिक जीवन में उतारने की प्रेरणा देते हुए कहा कि पर्युषण के दौरान केवल उपवास, एकासन अथवा बाहरी नियमों तक सीमित रहने के बजाय अपने भीतर भी झांकना चाहिए।
मनुष्य स्वयं से पूछे कि उसे किस बात का अभिमान है और क्या धन, रूप, पद, ज्ञान अथवा परिवार के कारण वह दूसरों को छोटा समझता है। उत्तम मार्दव की साधना तब सार्थक होगी, जब व्यक्ति ‘मैं’ को कम कर ‘हम’ को बढ़ाए, दूसरों का सम्मान करे और व्यवहार में सरलता व विनम्रता लाए।
फलदार वृक्ष के दृष्टांत से समझाया मार्दव धर्म
आचार्यश्री ने एक दृष्टांत सुनाते हुए बताया कि एक राजा को अपने धन, पद और शक्ति का बहुत अभिमान था। वह एक संत के पास पहुंचा और अपनी शक्ति का बखान करने लगा। संत उसे फल से लदे वृक्ष के पास ले गए और समझाया कि जिस वृक्ष पर जितने अधिक फल होते हैं, उसकी डालियां उतनी ही अधिक झुकती हैं।
आचार्यश्री ने इस प्रसंग का संदेश बताते हुए कहा, “जो वास्तव में बड़ा होता है, उसमें उतनी ही अधिक विनम्रता होती है।” गुण और सामर्थ्य बढ़ने के साथ व्यक्ति को फलदार वृक्ष की तरह झुकना सीखना चाहिए।
आज होगी उत्तम आर्जव धर्म की आराधना
पर्युषण पर्व के क्रम में उत्तम मार्दव धर्म के बाद अब उत्तम आर्जव धर्म की आराधना की जाएगी। इसमें मन, वचन और व्यवहार की सरलता तथा छल-कपट से दूर रहने का संदेश दिया जाएगा।





