देहरा तिजारा। श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, देहरा तिजारा के चंद्र तीर्थ मंडपम् में परम पूज्य भावलिंगी संत आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी महामुनिराज का 31वां मंगल चातुर्मास धर्म प्रभावना के साथ चल रहा है। धर्मसभा में आचार्य श्री ने साधना के मार्ग में आने वाले परिषहों को सहन करने तथा स्वयं के भीतर झांकने का संदेश दिया।
परिषह साधना की कसौटी
मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन एवं प्रचार मंत्री उमंग जैन ने बताया कि आचार्य श्री ने कहा कि निर्ग्रन्थ श्रमण साधकों की साधना का मूल आधार परिषहों को समभावपूर्वक सहन करना है। साधक जब परिषहों से घबराने के बजाय उन्हें सहन करता है, तब उसकी साधना में दृढ़ता आती है।
उन्होंने कहा कि रत्नत्रय की साधना केवल बाहरी रूप से करने की बात नहीं है, बल्कि जीवन में आने वाली विपरीत परिस्थितियों में भी समता बनाए रखना ही उसकी वास्तविक कसौटी है।
कठिनाइयों को अवसर मानें
आचार्य श्री ने कहा कि परिषह देखने और सुनने में कठिन लग सकते हैं, लेकिन जिसने उन्हें सहन करना सीख लिया, उसने साधना को सरलता से जीना सीख लिया। परिषह साधक के लिए रुकावट नहीं, बल्कि आत्मिक शक्ति को जागृत करने का अवसर हैं।
साधना के मार्ग पर कठिनाइयां आएंगी, लेकिन उनसे विचलित हुए बिना लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना ही साधक की पहचान है।
भगवान आदिनाथ की साधना का प्रसंग
आचार्य श्री ने भगवान आदिनाथ की साधना का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि भगवान आदिनाथ ने छह माह तक योग धारण किया। छह माह बाद जब वे आहार के लिए निकले तो उन्हें आहार की प्राप्ति नहीं हुई और आहार का अंतराय आया। भगवान ने उस वेदना को सहज भाव से सहन किया।
उन्होंने कहा कि यह प्रसंग बताता है कि साधना में परिस्थितियां कैसी भी हों, साधक को अपने भावों में विकार नहीं आने देना चाहिए।
दूसरों को नहीं, स्वयं को देखें
आचार्य श्री ने कहा, “कभी किसी का हाथ मत देखना, जब भी देखना अपना देखना।” उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल हाथ की लकीरों की बात नहीं, बल्कि अपने जीवन और आत्मा को देखने की बात है।
जो व्यक्ति दूसरों के जीवन को देखने में लगा रहता है, वह स्वयं के भीतर झांकना भूल जाता है। उन्होंने कहा कि साधु का जीवन संसार को देखने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को देखने और आत्मा को पहचानने के लिए होता है।
साधना में एकाग्रता जरूरी
आचार्य श्री ने कहा कि साधु को अपनी साधना से हटकर दूसरे कार्यों में नहीं उलझना चाहिए। साधक जितना अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र रहेगा, उतनी ही उसकी साधना सफल होगी।
उन्होंने कहा कि सच्चे साधु के दर्शन मात्र से भव्य जीवों के जीवन की दिशा बदल सकती है। साधु की साधना, तप और त्याग संसार में भटक रहे जीव को आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं
श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन की प्रेरणा
आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि साधु के जीवन को केवल देखने का विषय न बनाएं, बल्कि उनसे प्रेरणा लेकर अपने जीवन में संयम, समता, त्याग और आत्मचिंतन को स्थान दें। यही धर्म का वास्तविक लाभ है और आत्मकल्याण की दिशा में पहला कदम भी यही है।
समाजजनों की रही सहभागिता
इस अवसर पर मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन, महामंत्री नरेंद्र जैन, कोषाध्यक्ष शिंभू जैन, प्रचार मंत्री उमंग जैन, चातुर्मास अध्यक्ष सुरेश जैन (पटेल), अक्षत जैन, ऋषभ जैन, वात्सल्य जैन, सुरेंद्र जैन, राकेश जैन (मामू), सुभाष जैन (हरसोली वाले), संजय जैन एवं अंशुल जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।



