धरियावद। 48 दिवसीय भक्तामर महामंडल विधान के अंतर्गत शुक्रवार को 35वें दिन धार्मिक एवं भक्तिमय वातावरण में विधान का आयोजन हुआ। आचार्य कल्प पुण्यसागर जी महाराज के ससंघ के सान्निध्य में आयोजित विधान में 17 पुण्यार्जक परिवारों ने श्रद्धापूर्वक भाग लेकर मंडप पर 48 अर्घ्य समर्पित किए। बाल ब्रह्मचारिणी वीणा दीदी के भक्तिमय मार्गदर्शन में पूरे आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं ने भक्ति, आराधना और धार्मिक अनुष्ठानों में उत्साहपूर्वक सहभागिता की। विधान में मंडप पर मंत्रोच्चार, पूजन एवं अर्घ समर्पण से वातावरण भक्तिमय बना रहा। पुण्यार्जक परिवारों ने विधि-विधानपूर्वक भगवान की आराधना करते हुए अपने जीवन में धर्म, संयम और तप के संस्कारों को आत्मसात करने का संकल्प लिया।
ज्ञान अर्जित करने के लिए सतत परिश्रम जरूरी
प्रवचन श्रृंखला के अंतर्गत आचार्य कल्प पुण्यसागर जी महाराज ने सोलह कारण भावना के अंतर्गत ‘शक्तितस्य तप दिवस’ के रूप में बताते हुए तप की महत्ता पर प्रकाश डाला। आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में बिना तपे कुछ भी हासिल नहीं होता। संसार में धन, संपदा, प्रतिष्ठा अथवा ज्ञान अर्जित करने के लिए भी मनुष्य को निरंतर परिश्रम और कठिन साधना से गुजरना पड़ता है। तप व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है और उसके जीवन को संस्कारित करता है।
एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी जन्म लेती है
उन्होंने कहा कि इच्छाओं का निरोध करना ही तप है। मन में उठने वाली प्रत्येक इच्छा को पूरा कर देना तप नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं पर अंकुश लगाना और आवश्यकता होने पर उनका त्याग करना ही वास्तविक तपस्या है। मनुष्य की इच्छाओं का कोई अंत नहीं है। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। ऐसे में जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना सीख लेता है, वही वास्तविक अर्थों में तप की साधना कर सकता है।आचार्यश्री ने कहा कि तप केवल शरीर को कष्ट देने का नाम नहीं है, बल्कि यह मन, वचन और काया को संयमित करने की साधना है। तप के माध्यम से व्यक्ति अपनी आसक्ति, मोह और सांसारिक आकर्षण को कम करता है। तप आत्मशुद्धि का माध्यम है और इसके बल पर व्यक्ति का मोक्षमार्ग प्रशस्त होता है।
श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री का आशीर्वाद प्राप्त किया
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे तप को केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं। इच्छाओं पर नियंत्रण, संयमित जीवन, आत्मचिंतन और त्याग की भावना को अपनाकर ही मनुष्य अपने जीवन को सार्थक बना सकता है। विधान के 35वें दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही। भक्ति और आस्था से ओतप्रोत वातावरण में श्रद्धालुओं ने भक्तामर स्तोत्र की आराधना करते हुए धार्मिक अनुष्ठान में सहभागिता की। कार्यक्रम के अंत में श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री का आशीर्वाद प्राप्त किया तथा विधान के आगामी दिनों में भी इसी श्रद्धा और उत्साह के साथ सहभागी बनने का संकल्प लिया।




