सीकर। दंग की नसिया में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उपदेश में बताया कि गुरु की सेवा जिन्होंने तन मन धन से की है। गुरु की विपदा और उपसर्गों को स्वयं सहन कर सेवा की है। वह गुरु का सानिध्य प्राप्त कर जीवन को धर्म में लगाकर मुक्ति की राह पुरुषार्थ से दीक्षा धारण कर प्राप्त करते हैं। देव, शास्त्र ,गुरु की भक्ति से दीक्षा का फल मिलता है। कुछ ही बिरले पुण्यशाली व्यक्ति होते हैं जो जन्म मरण को संयम से सुमरण बनाते हैं।प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी,आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज की समाधि सल्लेखना साधुओं और श्रावकों के लिए एक आदर्श है। पुरुषार्थ करने वालों की कभी हार नहीं होती है।
अंतरंग से की गई भक्ति का फल मिलता है
डॉ राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने कहा कि संसार के विषय भोगों से विरक्त होकर गुरु सानिध्य में दीक्षा ली जाती है ।भोगी की अर्थी निकलती है जबकि, योगी साधु की समाधि में साधु भी शामिल होते हैं। पूजा ,गुरु भक्ति से कर्मों का नाश होता है। अंतरंग से की जाने वाली भक्ति का फल मिलता है।विषय कषायों की आसक्ति अच्छी बात नहीं है।
आचार्य श्री का द्रव्य से पूजन किया
अर्पित चूड़ीवाल गुवाहाटी के 16 कारण उपवास का पारणा किया गया। इसके पूर्व चूड़ीवाल परिवार असम द्वारा आचार्य श्री का विभिन्न द्रव्य से पूजन किया गया। दोपहर को आर्यिका श्री जिनेश मति माताजी के परिजनों द्वारा आचार्य श्री का पूजन किया गया। प्रातः काल आचार्य श्री संघ ने मोदी जी के जिनालय में दर्शन कर श्री जी का अभिषेक देखा।




