दिल्ली। पट्टाचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज ने दिल्ली में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि विचार और शब्द साहित्य व्यक्ति के विचारों की अभिव्यक्ति भाषा से होती है। आंतरिक भावों को शब्द वर्णों (भाषा) से ही व्यक्त किया जा सकता है। विचारों का प्रकटीकरण ही साहित्य के रूप में साकार होता है। एक विचारशील, परोपकारी ही साहित्य का सृजन कर सकता है। विचार-शून्य साहित्य-सृजन के लिए बाँझ स्त्री के समान अयोग्य होता है। विचारशील, गुणवान, समवदर्शी, करुणावान मानव, भविष्य का भगवान, सच्चा-गुरु ही अपने आंतरिक श्रेष्ठ-विचारों की धरोहर अमूल्य निधि, नवनीत, अमृत दुनिया को प्रदान करने के लिए, जन-जन के उपकार के लिए, संस्कृति के उद्योतन, संरक्षण, संवर्धन के लिए, विश्व विकास हेतु श्रेष्ठ-साहित्य का सृजन करते हैं। सद्विचारों की शाब्दिक अभिव्यक्ति ही साहित्य है। श्रेष्ठ-साहित्य ही पाठक को श्रेष्ठ बनाता है। श्रेष्ठता प्राप्त करना है, तो श्रेष्ठ-साहित्य का पारायण करो, चिंतन-मनन करो।

एक लकीर, तकदीर बदल देती है

वास्तव में जब भावितव्यता पवित्र होती है, तो संयोग भी व्यक्ति को अच्छे ही मिलते हैं। सच्चे-गुरु की एक लकीर व्यक्ति की तकदीर बदल देती है। गुरु की एक झलक शिष्य की दिशा बदल देती है। सूर्य की एक किरण अंधकार का क्षय कर उजास भर देती है। जब एक लकीर से जीवन की दशा व दिशा परिवर्तित हो सकती है, तो एक सद्-वाक्य पूरा शास्त्र निश्चित ही मानव को महा-मानव बनने की प्रेरणा देगा।

सही विचार: सबके लिए उपहार

सकारात्मक विचार ही सुख, समृद्धि, सफलता के मूल स्तंभ होते हैं। सही और सकारात्मक विचार जन-जन के लिए उपहार बनते हैं। सकारात्मक विचार विकास की ओर ले जाते हैं। सकारात्मक विचारों से हम अपनी आत्म रक्षा कर सकते हैं। दुनिया के विवादों से बचना है, तो हर हमेशा सकारात्मक विचार करो। सकारात्मक-सोच (विचार) सर्व विस्मादों पर विराम लगा देता है। सकारात्मक विचारों का यह चमत्कार होता है कि वह स्वयं की चिंताओं को क्षण-भर में दूर कर देता है और साथ ही-साथ आत्म विश्वास को बढ़ाता है। सकारात्मक विचार आशावादी बनाते हैं। सकारात्मक विचारों से आप सबके लिए उपहार बन सकते हैं। सकारात्मक विचार ही शांति का द्वार है।