दिल्ली। पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने धर्मसभा में कहा कि सबके दिन एक से नहीं होते। सब दिन एक से नहीं होते। दिन बदलते देर नहीं लगती। जिंदगी में किसके साथ क्या हो जाए पता नहीं? श्रीराम को राज्य मिलने वाला था, उसी दिन वनवास हो गया। श्रीकृष्ण का जन्म जेल में हुआ। सती सीता को गर्भवती अवस्था में वन में छोड़ दिया गया। दिन बदलते देर नहीं लगती। देखते-ही-देखते समय बदल जाता है। मुनिश्री सुव्रतसागर जी ने बताया कि आचार्यश्री ने कहा कि रावण ने सीता का हरण कर लिया था, परंतु फिर भी सीता श्रीराम की ही कहलाती थी। आप हरण तो कर सकते हो, वस्तु छीन सकते हो पर अपनी बना नहीं सकते। ऐसे. हमारा गिरनार तीर्थ कुछ लोग छीनना चाहते हैं, वह छीन सकते हैं पर गिरनार जैनों का था है और रहेगा।
अपमान नहीं, अपनत्व दो
आचार्यश्री ने कहा कि जिंदगी संभल-संभल कर जियो। भूलकर भी किसी का तिरस्कार मत करो। कब किस पर, कौन-सी विपत्ति आ जाए, कुछ पता नहीं। जियो और जीने दो। बुरे का फल बुरा ही होता है। क्षण भर की कषाय, भव-भव में पीड़ित करती है। कर्म किसी को नहीं छोड़ता। इसलिए कषाय करके कर्मों का आमंत्रित मत करो। जैसा बीज भूमि में बोओगे वैसी फसल होगी। अपने किए गए कुटिल भावों का फल जीव को स्वयं ही भोगना पड़ता है।
भजन करो, भगवान बनो
जो दान देता है उसकी जगत में प्रशंसा होती है। यश प्राप्त होता है और संपत्ति में वृद्धि होती है। जो जिनेंद्र प्रभु की पूजा करता है, उसको सुंदर रूप की प्राप्ति होती है। जो साधुओं की सेवा करता है, उसकी समाज में शीघ्र ही ख्याति फैल जाती है। श्रेष्ठ कार्य करो, क्योंकि श्रेष्ठता पाना है तो शुभकार्य करना ही होगा।
प्रण, प्राण, यश की रक्षा करो
प्रभु का नाम स्मरण करो, निश्चित कर्म का क्षय होगा। मन स्थिर करना है तो मंत्र जाप करो। सही सोचो, सही बोलो, सही रास्ते पर चलो। प्रयत्न पूर्वक प्रण प्राण एवं यश की रक्षा करो।



