मुरैना। नगर के बड़े जैन मंदिर में वर्षायोग कर रहे आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज के प्रभावक शिष्य मुनिश्री उपशांत सागर जी महाराज ने मंगलवार को केशलोच कर मुनियों के त्याग, संयम और साधना का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। दिगम्बर जैन मुनियों की कठोर साधना और आत्मसंयम का प्रतीक केशलोच का अनुपम दृश्य मंगलवार को बड़े जैन मंदिर में देखने को मिला। मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज ने प्रातःकालीन बेला में स्वयं अपने हाथों से सिर, दाढ़ी एवं मूंछों के बालों का केशलोच किया। मुनिश्री ने बालों को घास-फूस की तरह सहज भाव से उखाड़कर त्याग दिया। दिगम्बर जैन साधु संत साध्वी प्रत्येक दो तीन माह के अंतराल से नियमित कैशलोच करते हैं।
केशलोच के दौरान मुनिश्री शारीरिक पीड़ा सहते है
जैन दर्शन में केशलोच केवल शरीर के बालों का त्याग नहीं, बल्कि देह के प्रति ममत्व, सुख-सुविधाओं और परिग्रह से विरक्ति का प्रतीक माना गया है। मुनिराज के लिए यह साधना आत्मसंयम, सहनशीलता और वैराग्य की भावना को दृढ़ करने वाली होती है। केशलोच के दौरान मुनिश्री शारीरिक पीड़ा को समभावपूर्वक सहन करते हुए आत्मकल्याण की साधना में लीन रहे।
मुनिश्री का संदेश: धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं
इस अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने मुनिश्री की संयम साधना के दर्शन कर स्वयं को धन्य माना। मंदिर परिसर में श्रद्धा और भक्ति का वातावरण बना रहा। मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज की यह साधना श्रावकों के लिए भी प्रेरणादायी रही। उन्होंने संदेश दिया कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि शरीर के प्रति मोह को कम करके आत्मा के स्वरूप की ओर बढ़ना ही सच्ची धर्मसाधना है। मुनिराज का केशलोच त्याग, तप, संयम और वीतरागता की साधना का जीवंत उदाहरण है।



