इंद्रिय विषयों के कारण हमारा मन चंचल होता है-विनिश्चय सागर महाराज: मुनिश्री ने मन, इंद्रिय पर नियंत्रण पर दिया जोर

आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि जो इंद्रियों को अच्छा लगता है। वह हमें अच्छा लगता है जो आत्मा को अच्छा लगता है वह हमें अच्छा नहीं लगता। हमारा मन इंद्रिय विषयों में लगा हुआ है यही कारण है कि हमारा मन चंचल होता है। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर...
रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि जो इंद्रियों को अच्छा लगता है। वह हमें अच्छा लगता है जो आत्मा को अच्छा लगता है वह हमें अच्छा नहीं लगता। हमारा मन इंद्रिय विषयों में लगा हुआ है यही कारण है कि हमारा मन चंचल होता है। मुनिश्री ने कहा कि बंदर से भी ज्यादा विपरीत स्थिति हमारी है। इसका कारण इंद्रिय और मन की चंचलता है। जब तक हम इंद्रिय विषयों से विराम नहीं लेंगे तब तक मन शांत नहीं होगा। इंद्रिय विषयों से विराम ले लेंगे तो मन भी शांत हो जाएगा। उन्होंने कहा आप जो सोचते हैं वह करते नहीं जो बोलते हैं वह करते नहीं हमें इंद्रिय विषयों को सीमित करना होगा, प्रतिबंध लगाकर नहीं सही जगह लगाकर। अगर इंद्री विषयों पर प्रतिबंध लगाएंगे तो उल्टा हो जाएगा। सही जगह लगाएंगे तो सब संभव होगा इंद्रियों को जितना आवश्यक हो उतना लगाए। उन्होंने कहा कान से सुनना जरूरी है, लेकिन यह भी पता होना चाहिए क्या सुनना जरूरी है। ईयर फोन लगा लिए है हम अतिरिक्त सुन रहे हैं और मन चंचल हो रहा है। मन को इंद्रिय विषयों के लिए देते जा रहे हैं देते जा रहे हैं और मन और चंचल होता जाता है।मन विषय भोगों को भोगना चाहता है मन को गति और इंद्री के माध्यम से अपने उतना ही दिया होता जितना जरूरी है तो मन इतना चंचल नहीं होता। यहां वहां के कार्य से मन को चंचल करते हैं। मन विषय भोगों को भोगना चाहता है। मन एक ही जगह होना चाहिए मन कंट्रोल नियंत्रण की कला है यह भी विज्ञान है। मन पर नियंत्रण आ जाता है तो व्यक्ति ध्यान कर लेगा। मंगलवार की बेला में प्रवचन से पूर्व मंगलाचरण अभिषेक जैन लुहाड़िया ने किया। मुनिश्री ने कहा कि मन से काम लेना काम करना आना चाहिए ध्यान की शुरुआत मन के कंट्रोल से होती है। पहले निर्णय और लगन होनी चाहिए कि मुझे ध्यान करना है। अंतस चेतना में भाव होना चाहिए की मुझे ध्यान करना है। मै एकाग्र होना चाहता हूं ध्यान करना चाहता हूं तब कुछ होगा। ध्यान करने के लिए उन्होंने तीन चीजों विशेष ध्यान देने को कहा उन्होंने कहा कि ध्यान करने के लिए निर्णय लगन और कंट्रोल हो जाएगा तो ध्यान अपने आप होगा। ध्यान करने से अनंत कर्मों की निर्जरा होती है कर्म की निर्जरा ध्यान से होती है। जो हम नहीं करते। ध्यान करने से मानसिकता ठीक होती है और सोचने समझने की शक्ति आती है।जितना सोचेंगे बोलेंगे शारीरिक शक्ति कम होगी आचार्य श्री ने कहा कि इंद्रिय विषय में भोग कर लिए लेकिन आप कभी संतुष्ट नहीं होंगे अग्नि को जितना उलगाओगे वो उतना ही बढ़ जाएगी समाप्त नहीं होगी अच्छा है निर्णय कर लो डॉक्टर वैद्य के पास इसलिए जाना पड़ रहा है की ध्यान की प्रक्रिया हमारी सही नहीं है। कोरोना के विषय में कहा कि जो खाने योग्य है। वह जो सोचने योग्य है वह करते तो कोरोना नहीं होता। कोरोना ने सबको परिचय करा दिया कि आप क्या हो। इसमें मरने वाले पशु नहीं मनुष्य थे। पशुओं की सोच सीमित है। भोजन भी सीमित है लेकिन, मनुष्य का कुछ भी सीमित नहीं है। महाराज श्री ने कहा कि जितना सोचेंगे बोलेंगे शारीरिक शक्ति कम होगी। ध्यान सोच से शुरू होता है जब ध्यान कराया जाता है तो सिखाया जाता है कि मेरे अंदर असीम शक्ति है। बार-बार सोचो अंतस चेतना तक यह बात पहुंचाओ। सोए हुए व्यक्ति को जगाना पड़ता है। आत्म शक्ति को जगाया नहीं। इसका एहसास कराना चाहिए कि आपके पास असीम शक्ति है। ध्यान को प्रारंभ कर दो महत्वपूर्ण उपलब्धि नहीं प्रारंभ है। अपने आत्म कल्याण को उद्घाटित करो।
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