कुण्डलपुर (म.प्र.)। बड़े बाबा की अतिशय नगरी कुण्डलपुर में आयोजित दशलक्षण संस्कार शिविर के समापन समारोह में साधना, सेवा, त्याग, समर्पण और श्रम सम्मान का संदेश प्रमुखता से सामने आया।
निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समतासागर जी महाराज ने कहा कि व्यक्ति का महत्व उसके पद, प्रतिष्ठा अथवा आर्थिक योगदान से नहीं, बल्कि उसकी मेहनत और सेवा से होता है। समाज और आयोजन के लिए निस्वार्थ भाव से श्रम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति सम्मान का अधिकारी है।
पर्दे के पीछे सेवा करने वाले भी सम्मान के अधिकारी
मुनिश्री ने कहा कि दानदाता हो अथवा न हो, आयोजन में छोटा से छोटा व्यक्ति भी यदि अपनी क्षमता के अनुसार मेहनत कर रहा है, तो उसके श्रम का सम्मान होना चाहिए। अनेक कार्यकर्ता पर्दे के पीछे रहकर बिना अपेक्षा के अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं।
उन्होंने कार्यकर्ताओं के त्याग की तुलना घराती से करते हुए कहा कि जिस प्रकार घराती बरातियों की व्यवस्था करते-करते कई बार स्वयं भोजन से वंचित रह जाता है, उसी प्रकार आयोजन के कार्यकर्ता भी दूसरों की सुविधा के लिए अपनी सुविधा पीछे कर देते हैं। आयोजन की सफलता ही उनका सबसे बड़ा संतोष होती है।
प्रतिकूलता में भी शांत चित्त से पुरुषार्थ करें
संघस्थ मुनि श्री पवित्रसागर जी महाराज ने कहा कि परिस्थितियां हमेशा अनुकूल नहीं होतीं। साधक को प्रतिकूल परिस्थितियों में भी चित्त को शांत और स्थिर रखते हुए पुरुषार्थ करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि दशलक्षण महापर्व केवल दस दिनों की धार्मिक साधना नहीं, बल्कि जीवन को संस्कारित करने का अवसर है। पर्व में ग्रहण किए गए संयम और सद्गुणों को जीवन में बनाए रखना ही साधना की सार्थकता है। खान-पान की शुद्धता और घर की रसोई के संस्कारों पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि अच्छी शुरुआत घर से होती है।
कार्यकर्ताओं, शिविरार्थियों और तपस्वियों का सम्मान
प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्र प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि समापन समारोह में शिविर व्यवस्थाओं में दिन-रात जुटे कार्यकर्ताओं, शिविरार्थियों एवं तपस्वियों का कुण्डलपुर तीर्थक्षेत्र कमेटी के पदाधिकारियों ने सम्मान किया।
दस उपवास, छह उपवास एवं तीन उपवास की तपस्या करने वाले तपस्वियों की भी अनुमोदना कर उन्हें सम्मानित किया गया। संचालन ब्रह्मचारी भैया धीरज, राहतगढ़ एवं अनूप भैया ने किया।
प्रातः से रात्रि तक चलीं धार्मिक गतिविधियां
दशलक्षण संस्कार शिविर में प्रतिदिन प्रातः 5 बजे से देर रात्रि तक प्राणायाम, अभिषेक-शांतिधारा, पूजन, प्रवचन, तत्त्वार्थसूत्र वाचन एवं स्वाध्याय सहित विविध धार्मिक गतिविधियां हुईं।
सायंकाल आचार्य भक्ति, आरती एवं ‘समता समाधान’ कार्यक्रम में मुनि समतासागर महाराज ने शिविरार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान किया। धार्मिक तंबोला, जैन धर्म क्विज, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों एवं नाट्य मंचन ने भी शिविरार्थियों को धर्म और संस्कारों से जोड़े रखा।
विद्या समता फाउंडेशन ट्रस्ट की घोषणा
समापन समारोह में श्री विद्या समता फाउंडेशन ट्रस्ट की घोषणा संस्थापक सदस्य गोवर्धन जी पांड्या, वर्धा (महाराष्ट्र) द्वारा की गई। ट्रस्ट के माध्यम से जीवदया, शिक्षा छात्रवृत्ति, साधु-संघ गुरु सेवा एवं मीडिया प्रसारण सहित विभिन्न सेवा कार्यों में राशि का उपयोग किया जाएगा।
शिविरार्थियों ने भी अपनी लक्ष्मी का सदुपयोग करते हुए ट्रस्ट के लिए राशि घोषित की।
विभिन्न राज्यों से पहुंचे श्रद्धालु
शिविर में देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। आचार्य श्री विद्यासागर जीवदया केंद्र, भातकुली अमरावती के स्वयंसेवकों ने भोजनशाला में सेवा दी। आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की जन्मभूमि सदलगा, कर्नाटक से भी अनेक शिविरार्थी पहुंचे।
समापन समारोह में मुनि समतासागर महाराज के गृहस्थ जीवन के 95 वर्षीय पिता श्रेष्ठी श्री राजाराम जी भी विशेष रूप से उपस्थित रहे। वे शिविर अवधि में प्रतिदिन अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, आहारदान एवं व्रत-उपवास की साधना में सहभागी रहे।
एक नजर में
- मुनि समतासागर ने निस्वार्थ श्रम और सेवा को वास्तविक सम्मान का आधार बताया।
- मुनि पवित्रसागर ने प्रतिकूलता में शांत चित्त से पुरुषार्थ करने का संदेश दिया।
- कार्यकर्ताओं, शिविरार्थियों एवं तपस्वियों का सम्मान किया गया।
- धार्मिक गतिविधियों के साथ क्विज, सांस्कृतिक और नाट्य कार्यक्रम हुए।
- जीवदया, शिक्षा एवं गुरु सेवा के लिए विद्या समता फाउंडेशन ट्रस्ट की घोषणा हुई।
श्रीफल संवाद : कुण्डलपुर, मध्यप्रदेश




