मुरैना। दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में ज्ञान रत्नाकर आचार्य श्री उदारसागर महाराज ने उत्तम तप धर्म की महिमा बताते हुए कहा कि तप के प्रताप से कर्मों की निर्जरा होती है। तप वह आध्यात्मिक ताप है, जो कर्मों के आवरण को क्षीण कर आत्मा के स्वाभाविक गुणों को प्रकट करने में सहायक बनता है।
उन्होंने कहा कि आत्मा में अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत शक्ति का स्वभाव विद्यमान है, लेकिन कर्मों के आवरण के कारण आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकट नहीं कर पाती।
कच्चे आम और घड़े से समझाया तप का महत्व
आचार्यश्री ने कहा कि कच्चे आम में मिठास का गुण होते हुए भी वह कच्चा रहने तक उसे प्रकट नहीं कर पाता। उचित ताप मिलने पर वही आम पककर मधुर हो जाता है। इसी प्रकार तप आत्मा में छिपे गुणों को प्रकट करने का माध्यम बनता है।
कच्चे घड़े का दृष्टांत देते हुए उन्होंने कहा कि कच्चा घड़ा पानी को धारण नहीं कर सकता। अग्नि में तपने के बाद वही मिट्टी मजबूत घड़े का रूप धारण कर लेती है और मंगल कलश बनकर शुभ कार्यों में प्रतिष्ठित होती है। तप और संयम की अग्नि में कर्मों की निर्जरा होने पर आत्मा की शुद्धता प्रकट होती है।
शरीर नहीं, कर्मों को जलाने का पुरुषार्थ करें
मुनिश्री ने कहा कि आत्मा को परिपक्व बनाने के लिए बाहरी ताप से अधिक भीतर का तप आवश्यक है। भूख-प्यास सह लेना तप का एक रूप हो सकता है, लेकिन यदि क्रोध, मान, माया, लोभ और विषय-कषाय कम नहीं हो रहे हैं तो तप का आध्यात्मिक उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि तप की अग्नि में शरीर नहीं, कर्मों को जलाने का पुरुषार्थ करना है। केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि आत्मा को परभाव से हटाकर स्वभाव में लाने का प्रयास ही तप का वास्तविक निष्कर्ष है।
केवल भूखे-प्यासे रहना उपवास नहीं
मुनि श्री उपशांतसागर महाराज ने कहा कि तप का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि मन, वचन और काया को संयमित रखते हुए विषय-कषायों से दूर होना है। केवल अन्न, जल अथवा फल का त्याग कर भूखे रहना ही व्रत या उपवास नहीं है।
उन्होंने कहा कि उपवास का अर्थ आत्मा के निकट रहना है। जब उपवास के साथ क्रोध, मान, माया, लोभ और इंद्रिय-विषयों का त्याग होता है, तभी तप आत्मशुद्धि का माध्यम बनता है। बाहरी तप के साथ आंतरिक तप भी आवश्यक है, तभी साधना सार्थक होती है।
महेंद्रकुमार शास्त्री कर रहे दस धर्मों की व्याख्या
नगर के सभी जिनालयों में दशलक्षण पर्व की धूम है। बड़े जैन मंदिर में आचार्य उदारसागर महाराज एवं मुनि उपशांतसागर महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में तथा श्री गोपाल दिगंबर जैन सिद्धांत संस्कृत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य प्रतिष्ठाचार्य पंडित महेंद्रकुमार शास्त्री ‘व्याकरणाचार्य’ के निर्देशन में प्रातःकाल श्री जिनेन्द्र प्रभु का जलाभिषेक, शांतिधारा, नित्यमह पूजन एवं संगीतमय विशेष पूजन हो रही है।
सायंकाल महेंद्रकुमार शास्त्री शास्त्रगद्दी पर विराजमान होकर प्रतिदिन एक-एक धर्म की सरल व्याख्या कर साधर्मी बंधुओं को समझा रहे हैं। इसके बाद महाआरती, प्रश्नमंच एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं।
आज होगी उत्तम त्याग धर्म की पूजा
दशलक्षण पर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म की पूजा एवं आराधना की जाएगी।
श्रीफल साथी : मनोज जैन नायक, मुरैना





