मुरैना। दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में उत्तम सत्य धर्म की श्रद्धा एवं भक्तिभाव से आराधना की गई। धर्मसभा में ज्ञान रत्नाकर आचार्य श्री उदारसागर जी महाराज ने कहा कि सत्य आत्मा का स्वभाव है और असत्य आत्मा के स्वभाव के विपरीत आचरण है। सत्य को केवल बोलने तक सीमित न रखकर विचार, व्यवहार और आचरण में भी उतारना चाहिए।
एक झूठ को छिपाने के लिए बोलने पड़ते हैं अनेक झूठ
आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य कई बार स्वार्थ, धन, मान-सम्मान, अपने दोष छिपाने या दूसरे को नीचा दिखाने के लिए असत्य का सहारा लेता है। लेकिन इससे समस्या समाप्त नहीं होती। एक झूठ को छिपाने के लिए अनेक झूठ बोलने पड़ते हैं और व्यक्ति स्वयं अपने लिए उलझनों का जाल तैयार कर लेता है।
उन्होंने कहा कि सत्य बोलने वाला व्यक्ति भीतर से निर्भय और शांत रहता है, जबकि असत्य बोलने वाले व्यक्ति के मन में अपनी बात उजागर होने का भय बना रहता है।
सत्य के साथ मधुरता, करुणा और विवेक भी जरूरी
आचार्य उदारसागर जी ने कहा कि सत्य का अर्थ किसी को कटु शब्द कहकर यह तर्क देना नहीं है कि हमने तो सत्य कहा है। सत्य के साथ हित, विवेक, मधुरता, करुणा और संयम का होना भी आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि ऐसी बात जो सत्य होते हुए भी किसी को अनावश्यक पीड़ा पहुंचाए या वैमनस्य उत्पन्न करे, उसे कहने से पहले विवेक करना चाहिए। जैन धर्म सत्य के माध्यम से वाणी की शुद्धि और आत्मा की निर्मलता की दिशा दिखाता है।
अपनी कमियों को स्वीकार करना भी सत्य की साधना
आचार्य श्री ने कहा कि उत्तम सत्य धर्म की शुरुआत स्वयं से होती है। दूसरों से सत्य की अपेक्षा करने से पहले व्यक्ति को स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या वह अपने प्रति ईमानदार है।
अपनी कमियों को स्वीकार करना, भूल को मानना और उसमें सुधार करने का प्रयास करना भी सत्य धर्म की साधना है। कथनी और करनी में एकरूपता सत्य के मार्ग की महत्वपूर्ण कसौटी है।
व्यापार में ईमानदारी, परिवार में पारदर्शिता, समाज में विश्वास और धार्मिक जीवन में निष्कपटता सत्य धर्म के व्यावहारिक रूप हैं।
‘भूल छिपाने के बजाय स्वीकार कर सुधारें’
मुनि श्री उपशांतसागर जी महाराज ने कहा कि वाणी मनुष्य के व्यक्तित्व का आईना है। मुख से निकला एक शब्द किसी को प्रसन्न कर सकता है और वही शब्द किसी के हृदय को चोट भी पहुंचा सकता है।
उन्होंने कहा कि बोलने से पहले विचार करना चाहिए कि हमारी बात सत्य है या नहीं, आवश्यक है या नहीं और उससे किसी जीव को अनावश्यक पीड़ा तो नहीं होगी।
मुनि श्री ने कहा कि अपनी भूल को छिपाने के बजाय उसे स्वीकार करना और सुधारना सच्ची धर्म साधना है। उत्तम सत्य धर्म को केवल पूजा और प्रवचन तक सीमित न रखकर परिवार, व्यापार और सामाजिक व्यवहार में भी उतारना चाहिए।
धूप दशमी पर जिनालयों में होगी विशेष आराधना
दशलक्षण महापर्व के छठे दिन धूप दशमी पर्व मनाया जाएगा। इस अवसर पर नगर के जिनालयों में श्रद्धालु भगवान जिनेंद्र का अभिषेक, पूजन एवं आराधना कर शुद्ध एवं अहिंसक सामग्री से निर्मित धूप अर्पित करेंगे।
धूप अर्पित करने के पीछे राग-द्वेष और कषायों को कम कर आत्मशुद्धि का भाव रखने की प्रेरणा जुड़ी है। जिस प्रकार धूप की सुगंध चारों ओर फैलती है, उसी प्रकार व्यक्ति के जीवन में सदाचार, संयम, अहिंसा और धर्माचरण की सुगंध समाज तक पहुंचे, यही इसका संदेश है।





